देश की औद्योगिक राजधानी मुम्बई में सरे-आम लोगों को मारने वाले, देश के अस्मिता की हत्या की साजिश में अपराधी साबित हो चुके कसाब को परसों जब फांसी दी गई तो देश के लोगों ने खुशियां जाहिर कीं। मुझे लगता है कि यह दरअसल खुशियां कम संतोष का प्रदर्शन अधिक था। कसाब तो फांसी से पहले ही मर चुका था। उसके होने को पाकिस्तान नकार चुका था। उसके परिवार वालों ने भी उससे रिश्ता तोड़ ही लिया था। जिन लोगों को कसाब ने अपने साथियों के साथ मिलकर मारा, उनके परिजन कसाब की लाश को कल्पना में कितनी ही बार उकेर चुके होंगे। फांसी तो समापन था उन औपचारिकताओं का, जिनपर हमारे देश के करोड़ों रूपये खर्च हो रहे थे। एक पंेडिंग काम खतम होने की खानापूर्ति ही थी कसाब को फांसी पर लटका दिया जाना।
परन्तु कसाब को फांसी पर लटका देने से हमारे देश की ईज्जत तो नहीं ही बढ़ी। जिस कसाब ने खुले आम निर्दोष लोगों को जेहाद के नाम पर मारा, उसे हमने न्यायिक प्रक्रिया के उपरान्त भी डरते हुए, चोरी छिपे फांसी दी। उसने कु्ररता को खुले आम अंजाम दिया और हमने मानवता के हक में न्यायिक प्रक्रिया को भी डर कर पूरा किया। आखिर क्यों? किसका डर था हमें? क्या हमने विश्व के सामने भारत के नेताओं के मन में छिपे डर को ही उजागर नहीं किया? फिर कसाब की कब्र बनाना? हद है हमारे देश के नेताओं के मूर्खता की।
22/11/2012