Sunday, September 5, 2010
मेरी पहली किताब
मेरा पहला कहानी संग्रह आज मेरे हाथों में आया। सोचा था कि अपनी पहली किताब को हाथ में लेने का रोमांच कुछ अलग ही महसूस होगा परन्तु ऐसा नहीं हुआ। आदरणीय मोहन जी सपरा के साथ किताब के निर्माण में शुरू से जुड़ा रहा, प्रकाशन का हिस्सा बन कर, इसलिए वह रोमांच अपने आप ही खतम हो गया। परन्तु किताब के निर्माण में जुड़े होने से जो हासिल हुआ, वह उस रोमांच से कुछ अधिक महत्वपूर्ण था। इसलिए अच्छा लगा।
किताब तो आ गई। अब इस रोमांच या सुख में हस्तक्षेप की बात कहंा पर रह जाती है?
मैंने किताब के लेखकीय में जिन दो लोगों को धन्यवाद नहीं दिया वे हैं मेरी पत्नी निशा तथा मेरा बेटा भारत। मैंने इनके हिस्से का समय इस किताब को दिया। क्या यह उचित था? किताब के लिए शायद उचित होगा परन्तु इनके लिए? कदापि नहीं! उनके हिस्से के सुख से यह किताब लिखी गई और किताब में उनका जिक्र भी नहीं। मैं शर्मिन्दा हूं। कोई भी लेखक जब कोई कृति करता है, तो उसपर पहला हक उनका होता है, जिनके हिस्से के समय से वह कृति रची गई है। उनके ऋण से मुक्त होना बहुत मुश्किल है।
किताब तो आ गई। अब इस रोमांच या सुख में हस्तक्षेप की बात कहंा पर रह जाती है?
मैंने किताब के लेखकीय में जिन दो लोगों को धन्यवाद नहीं दिया वे हैं मेरी पत्नी निशा तथा मेरा बेटा भारत। मैंने इनके हिस्से का समय इस किताब को दिया। क्या यह उचित था? किताब के लिए शायद उचित होगा परन्तु इनके लिए? कदापि नहीं! उनके हिस्से के सुख से यह किताब लिखी गई और किताब में उनका जिक्र भी नहीं। मैं शर्मिन्दा हूं। कोई भी लेखक जब कोई कृति करता है, तो उसपर पहला हक उनका होता है, जिनके हिस्से के समय से वह कृति रची गई है। उनके ऋण से मुक्त होना बहुत मुश्किल है।
Wednesday, September 1, 2010
एक सबक
मेरी उस संस्था को एक साल से अधिक हो गया है, जिसे मैंने स्थापित किया था। परन्तु एक साल बाद ही मैं मेरी संस्था से हटा दिया। क्या कारण मेरे साथियों का बना गुट था अथवा मेरा अधिक आदर्शवादी होना? अथवा फिर मेरा हर किसी के लिए पूर्ण रूप से सहज हो जाना। मैं समझ नहीं पाया था कि किसी संस्था में निरपेक्ष लोगों का होना बहुत लाजमी है। मेरे साथ जो दोस्त जुड़े, उनका आपस में एक गुट था। वे सक्रिय थे परन्तु वे चाहते थे कि वे अपने काम को ऐेसे अंजाम दें मानो कुछ दोस्त मिलकर काम कर रहे हों। मैं उनका दोस्त नहीं था। जाहिर है इसलिए मैं उनके बीच तब उपेक्षित हो गया जब उन्होंने सारे कामों को, जिनमें फैसले लेने शामिल थे, सम्हाल लिया। मैं प्रारम्भ से ही अपने दोस्तों के फैसलों को स्वीकार करता रहा था। परिणाम अजीब रहा। वे मेरी उपस्थिति कम से कम चाहने लगे। फिर हमारे मध्य एक ऐसा सदस्य आया, जो जरूरत से अधिक मैच्योर था। ऐसे लोग दूसरों का मजाक उड़ाने लगते हैं। मैंने अपने दोस्तों के रूख को सहज स्वीकार किया और अलग होना चाहा। परन्तु यह भी मेरे साथियों को स्वीकार नहीं था। शायद इसलिए कि फिर विवादास्पद फैसलों में किसका नाम लिया जाएगा। या फिर शायद यह कारण रहा कि वे मेरे प्रभाव से जुड़े मेरे कुछ साथियों के प्रश्नों से बचना चाहते थे।
मैं आज स्वयं को अपनी ही संस्था से पूरी तरह विमुख पाता हूं। मैंने अपनी प्रथम किताब के अन्तिम पृष्ठ पर स्वयं को अपनी संस्था का संस्थापक अध्यक्ष लिखा तो है परन्तु मैं जानता हूं कि मेरे साथियों को शायद यह भी पसन्द नहीं आएगा।
मैंने अपनी जिन्दगी का सबक लिया है कि किसी संस्था को शुरू करते समय किसी एक गुट को उसमें शिरकत मत करने दो। संस्था के लिए यह कदापि उचित नहीं हो सकता।
परन्तु क्या इसमें मेरी कमी नहीं रही होगी? यदि मेरे साथी मेरे से नहीं जुड़ सके तो कुछ तो कमी मेरे में थी ही। हालांकि इस समय मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर क्या कमी रही थी मेरे में-शायद आगे कभी मैं महसूस कर सकूं अपनी कमी को।
मैं आज स्वयं को अपनी ही संस्था से पूरी तरह विमुख पाता हूं। मैंने अपनी प्रथम किताब के अन्तिम पृष्ठ पर स्वयं को अपनी संस्था का संस्थापक अध्यक्ष लिखा तो है परन्तु मैं जानता हूं कि मेरे साथियों को शायद यह भी पसन्द नहीं आएगा।
मैंने अपनी जिन्दगी का सबक लिया है कि किसी संस्था को शुरू करते समय किसी एक गुट को उसमें शिरकत मत करने दो। संस्था के लिए यह कदापि उचित नहीं हो सकता।
परन्तु क्या इसमें मेरी कमी नहीं रही होगी? यदि मेरे साथी मेरे से नहीं जुड़ सके तो कुछ तो कमी मेरे में थी ही। हालांकि इस समय मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर क्या कमी रही थी मेरे में-शायद आगे कभी मैं महसूस कर सकूं अपनी कमी को।
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