Thursday, November 11, 2010

भारत या ‘इंडिया दैट इज भारत’



मेरे मन में एक बहस बहुत बार चल चुकी है। एक बात मुझे वर्षों सेे खटकती है कि क्या हमारे देश का संवैधानिक नाम ‘इंडिया दैट इज भारत’ उचित है? क्या इस नाम से हमारे देश की स्वाधीनता दागदार नहीं दिखती? क्या यह नाम एक स्वयंभू राष्ट्र का नाम प्रतीत होता है? इंडिया किसके लिये? फिर दैट इज भारत? हम किसे बताना चाहते हैं कि ‘ इंडिया वह जो कि भारत है।’ आखिर किसी देश का ऐसा नाम हो सकता है जो अपने नाम में स्वयं के प्रति शंका उत्पन्न करता है? 
क्या ऐसे नाम को बदलने के लिए एक मुहिम नहीं चलाई जानी चाहिए? यदि हां तो मैं निवेदन करूंगा कि आप अपने विचार दें जो मार्ग प्रशस्त कर सकें हमारे देश की स्वाधीनता को बेदाग करने के लिए। आपके विचार एक दस्तावेज बन जाएंगे और शायद इतिहास रच सकें।
पुनश्चः जब शहरों तथा राज्यों के नाम राजनीतिक कारणों से भी परिवर्तित किए जा सकते हैं तो राष्ट्रधर्मिता के लिए, देश के स्वाभिमान के लिए देश का गलत तथा परायों द्वारा थोपा गया नाम क्यों नहीं बदला जा सकता?

Sunday, November 7, 2010

आस्तिक या नास्तिक

कुछ दिनों पूर्व मेरी दो ऐसे लेखकों से मुलाकात हुई जो स्वयं को नास्तिक कहते हैं। दोनों बुजूर्ग हैं तथा लगभग 25 वर्षों से वे परमात्मा को नहीं मानते। मेरे लिए यह पहला अवसर था जब मैंने परमात्मा को नहीं मानने वालों के तर्क सुने। वे तर्कशील सोसायटी से भी जुड़े हैं। मुझे लगता था कि नास्तिक होने से इन्सान अपनी अच्छाईयों तथा बुराईयों को परिभाषित नहीं कर पाता होगा। यह भी लगता था कि नास्तिक व्यक्ति के स्वभाव में एक प्रकार का अक्खड़पन भी होता होगा। परन्तु दोनों व्यक्तियों में ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। दोनों बहुत ही कोमल स्वभाव के व्यक्ति हैं। दोनों के मन में मैंने दूसरों के लिए बहुत सम्मान-भाव देखा। मुझे नहंी पता कि वे दुखी होने पर स्वयं के मन को कैसे सम्हालते होंगे, परन्तु मैंने उन दोनों के चेहरे पर एक प्रकार का संतोष देखा। यह मेरे लिए आश्चर्य की बात है। हालांकि मैंने जब उनसे कहा कि परमात्मा की उपस्थिति का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण न होने से आप परमात्मा को नहीं मानते तो भावनाएं भी कहीं नहीं दिखतीं। उनकी भी उपस्थिति को आप प्रमाणित नहीं कर सकते परन्तु आप मानते हैं कि भावनाएं सारी दुनिया चलाती हैं। यह विरोधाभास क्यों? इसका उनके पास जो उत्तर था, वह मुझे स्वीकार नहीं था। हमारी वार्ता अधूरी रही, चूंकि यह अपने आप में बहुत विस्तृत विषय है। पता नहीं, आप सब क्या सोचते हैं। मैं परमात्मा को मानना नहीं छोड़ सकता, परन्तु इन दोनों से मिलकर मुझे लगा कि नास्तिकों के तर्क को आजमाने के लिए हमें उन्हें समझना जरूरी है। पर उनसे तर्क करने से पहले हम स्वयं को टटोलें कि क्या कभी-कभी हमें भी यह नहीं लगता कि परमात्मा संभवतः नहीं भी हो सकता है। वरना मासूमों का मांओं के सामने कत्ल, परिवार के सामने स्त्रियों की लूटती आबरू, यह सब क्या परमात्मा को हिला नहीं डालती होंगी? अगर सच्ची प्रार्थना परमात्मा अवश्य सुनता है तो ऐसे अवसरों पर पीड़ितों की आत्मा से निकली प्रार्थना का क्या होता है? इससे सच्ची प्रार्थना और क्या होती होगी?