हिन्दी पर खतरा...पर कितना?
भाषा स्वयं में एक यात्रा है। मानव ने जब से बोलना सीखा तभी से यह यात्रा प्रारम्भ है। मानव की जीभ ने जब किसी विशेष ध्वनि को बार-बार दोहराया होगा तभी भाषा के बीज पड़ गए होंगे। जब इन ध्वनियों की संख्या बढ़ने लगी और यह एक मुख से दूसरे मुख में जाने लगे तो भाषा ने अपना विस्तार शुरू कर दिया। कितने हैरानी की बात है न कि पृथ्वी पर सबसे महान आविष्कार उस मानव ने किए जो आदिम या जंगली कहलाता था। आग, खेती, पहिया और भाषा इस श्रेणी के आविष्कारों में आते हैं। और भी चीजें इस श्रेणी में आ सकती हैं परन्तु इन्हीं चीजों ने इन्सान को इस स्थिति तक पहुंचाया है कि मैं यहां बैठा लिख रहा हूं और आप सैकड़ों मील दूरी पर बैठे मुझे पढ़ रहे हैं।
यह भाषा के विस्तार का चरम है। परन्तु क्या वास्तव में? भाषा क्या इससे अधिक विकसित नहीं होगी? होगी...हो रही है। भाषाएं परस्पर मिल रही हैं। यात्रा के विभिन्न चरण एक ही आंगन में एक दूसरे से मिल रहे हैं। ऐसे में कोई भाषा अपने मूल रूप में नही रह सकती। हर जीव यात्रा करता है अपनी भाषा के साथ। यात्रा में यह दूसरों से मिलता है और भाषा एक-दूसरे में मिलती है।
ऐसे में हिन्दी भाषा के प्रति हम खतरा महसूस क्यों कर रहे हैं? क्या हिन्दी भाषा वास्तव में खतरे में है? क्या इसे अंगे्रजी से खतरा है?
अंग्रेजी से सभी भाषाए दब जाती हैं। वह इसलिए नहीं कि इस भाषा की नुमाईन्दगी करने वालों ने कोई षड्यंत्र रच दिया था। अंग्रेजी ग्रेट ब्रिटेन की भाषा थी। ग्रेट ब्रिटेन पूरी पृथ्वी पर फैला था। दुनिया पर राज करने का दंभ लिए अंग्रेजों ने खुद को सबसे अभिजात्य वर्ग के रूप में स्थापित कर दिया था और अंग्रेजी इनकी ही भाषा थी। इसलिए अंग्रेजी को सबसे अभिजात्य भाषा होने का तमगा स्वतः मिल गया। फिर यह बिना विशेष व्याकरण की भाषा थी। इसमें सबसे अधिक प्रयोग हो सकते थे। इसलिए इसने न सिर्फ हिन्दी को बल्कि पूरे विश्व की तमाम भाषाओं को दोयम कर दिया। इसे अधिक सम्मान दिया जाने लगा। इतना सम्मान कि खुद की भाषा के प्रति सम्मान कम होने का खतरा उत्पन्न हो गया।
समस्या यही थी। समस्या यही है।
आज हिन्दी दिवस मनाने की आवश्यकता भी इसलिए पड़ी कि हिन्दी के प्रति लोगों के मन में सम्मान का भाव लाया जा सके। समस्या यह नहीं कि अंग्रेजी हमपर हावी है, यह दरअसल पूरे विश्व में हावी है, समस्या यह है कि अपनी मातृभाषा को भी वह सम्मान नहीं दिया जा रहा, जिसकी वह हकदार है।
जब हम हिन्दी में सोचते हैं, बात करते हैं, सपने देखते हैं तो हम हिन्दी पर गर्व क्यों नहीं करते? यह गर्व किसी से उच्च होने का नहीं होना चाहिए, यह इस बात का होना चाहिए कि हम उस भाषा के भाषी हैं, जो साहित्य के हर भाव को पूरी गहराई से व्यक्त करने में सक्षम है। मानव मन के हर भाव को शब्दों में ढाल लेने में सक्षम है।
हिन्दी को एक अन्य वर्ग से खतरा है। वह वर्ग है हिन्दी बोलने वालों का। जी हां, हिन्दी बोलने वाले हिन्दी के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। वह इसलिए कि आज जब फेसबुक, व्हाॅट्सएप और सोशल मीडिया के अन्य साधनों ने सभी को बोलने, लिखने का अवसर दे दिया है तो हर वह व्यक्ति, जो हिन्दी को सही तरीके से लिख नहीं सकता, हिन्दी में अपने उद्गार व्यक्त कर रहा है। उसकी मात्राएं सही नहीं हैं। उसका व्याकरण सही नहीं है। हो सकता है कि कुछ लोग इसे हिन्दी के प्रजातंत्र का युग कहें परन्तु हिन्दी का मूल रूप एक अनुशासनबद्ध तरीके से विकसित हुआ है। मूलतः संस्कृत और उसके अपभं्रश से निकली यह भाषा समृद्ध व्याकरण से बनी हुई है। हिन्दी अपने व्याकरण से मुक्त की जा रही है। एक हद तक तो यह ठीक है परन्तु व्याकरण से पूरी तरह मुक्त कर देना इस भाषा को खतरे में डाल रहा है।
इसलिए बेशक हिन्दी को भाषाओं के यात्रा के इस तेज दौर में स्वतंत्र करने की बात उठे, उसके व्याकरण और शब्द संपदा को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है।
हमारी हिन्दी दिवस की सार्थकता इस परिप्रेक्ष्य में देखी जानी चाहिए।
-सुरेश बरनवाल/14 सितम्बर 2018
भाषा स्वयं में एक यात्रा है। मानव ने जब से बोलना सीखा तभी से यह यात्रा प्रारम्भ है। मानव की जीभ ने जब किसी विशेष ध्वनि को बार-बार दोहराया होगा तभी भाषा के बीज पड़ गए होंगे। जब इन ध्वनियों की संख्या बढ़ने लगी और यह एक मुख से दूसरे मुख में जाने लगे तो भाषा ने अपना विस्तार शुरू कर दिया। कितने हैरानी की बात है न कि पृथ्वी पर सबसे महान आविष्कार उस मानव ने किए जो आदिम या जंगली कहलाता था। आग, खेती, पहिया और भाषा इस श्रेणी के आविष्कारों में आते हैं। और भी चीजें इस श्रेणी में आ सकती हैं परन्तु इन्हीं चीजों ने इन्सान को इस स्थिति तक पहुंचाया है कि मैं यहां बैठा लिख रहा हूं और आप सैकड़ों मील दूरी पर बैठे मुझे पढ़ रहे हैं।
यह भाषा के विस्तार का चरम है। परन्तु क्या वास्तव में? भाषा क्या इससे अधिक विकसित नहीं होगी? होगी...हो रही है। भाषाएं परस्पर मिल रही हैं। यात्रा के विभिन्न चरण एक ही आंगन में एक दूसरे से मिल रहे हैं। ऐसे में कोई भाषा अपने मूल रूप में नही रह सकती। हर जीव यात्रा करता है अपनी भाषा के साथ। यात्रा में यह दूसरों से मिलता है और भाषा एक-दूसरे में मिलती है।
ऐसे में हिन्दी भाषा के प्रति हम खतरा महसूस क्यों कर रहे हैं? क्या हिन्दी भाषा वास्तव में खतरे में है? क्या इसे अंगे्रजी से खतरा है?
अंग्रेजी से सभी भाषाए दब जाती हैं। वह इसलिए नहीं कि इस भाषा की नुमाईन्दगी करने वालों ने कोई षड्यंत्र रच दिया था। अंग्रेजी ग्रेट ब्रिटेन की भाषा थी। ग्रेट ब्रिटेन पूरी पृथ्वी पर फैला था। दुनिया पर राज करने का दंभ लिए अंग्रेजों ने खुद को सबसे अभिजात्य वर्ग के रूप में स्थापित कर दिया था और अंग्रेजी इनकी ही भाषा थी। इसलिए अंग्रेजी को सबसे अभिजात्य भाषा होने का तमगा स्वतः मिल गया। फिर यह बिना विशेष व्याकरण की भाषा थी। इसमें सबसे अधिक प्रयोग हो सकते थे। इसलिए इसने न सिर्फ हिन्दी को बल्कि पूरे विश्व की तमाम भाषाओं को दोयम कर दिया। इसे अधिक सम्मान दिया जाने लगा। इतना सम्मान कि खुद की भाषा के प्रति सम्मान कम होने का खतरा उत्पन्न हो गया।
समस्या यही थी। समस्या यही है।
आज हिन्दी दिवस मनाने की आवश्यकता भी इसलिए पड़ी कि हिन्दी के प्रति लोगों के मन में सम्मान का भाव लाया जा सके। समस्या यह नहीं कि अंग्रेजी हमपर हावी है, यह दरअसल पूरे विश्व में हावी है, समस्या यह है कि अपनी मातृभाषा को भी वह सम्मान नहीं दिया जा रहा, जिसकी वह हकदार है।
जब हम हिन्दी में सोचते हैं, बात करते हैं, सपने देखते हैं तो हम हिन्दी पर गर्व क्यों नहीं करते? यह गर्व किसी से उच्च होने का नहीं होना चाहिए, यह इस बात का होना चाहिए कि हम उस भाषा के भाषी हैं, जो साहित्य के हर भाव को पूरी गहराई से व्यक्त करने में सक्षम है। मानव मन के हर भाव को शब्दों में ढाल लेने में सक्षम है।
हिन्दी को एक अन्य वर्ग से खतरा है। वह वर्ग है हिन्दी बोलने वालों का। जी हां, हिन्दी बोलने वाले हिन्दी के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। वह इसलिए कि आज जब फेसबुक, व्हाॅट्सएप और सोशल मीडिया के अन्य साधनों ने सभी को बोलने, लिखने का अवसर दे दिया है तो हर वह व्यक्ति, जो हिन्दी को सही तरीके से लिख नहीं सकता, हिन्दी में अपने उद्गार व्यक्त कर रहा है। उसकी मात्राएं सही नहीं हैं। उसका व्याकरण सही नहीं है। हो सकता है कि कुछ लोग इसे हिन्दी के प्रजातंत्र का युग कहें परन्तु हिन्दी का मूल रूप एक अनुशासनबद्ध तरीके से विकसित हुआ है। मूलतः संस्कृत और उसके अपभं्रश से निकली यह भाषा समृद्ध व्याकरण से बनी हुई है। हिन्दी अपने व्याकरण से मुक्त की जा रही है। एक हद तक तो यह ठीक है परन्तु व्याकरण से पूरी तरह मुक्त कर देना इस भाषा को खतरे में डाल रहा है।
इसलिए बेशक हिन्दी को भाषाओं के यात्रा के इस तेज दौर में स्वतंत्र करने की बात उठे, उसके व्याकरण और शब्द संपदा को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है।
हमारी हिन्दी दिवस की सार्थकता इस परिप्रेक्ष्य में देखी जानी चाहिए।
-सुरेश बरनवाल/14 सितम्बर 2018