Thursday, November 22, 2012

अजमल कसाब को फांसी!


देश की औद्योगिक राजधानी मुम्बई में सरे-आम लोगों को मारने वाले, देश के अस्मिता की हत्या की साजिश में अपराधी साबित हो चुके कसाब को परसों जब फांसी दी गई तो देश के लोगों ने खुशियां जाहिर कीं। मुझे लगता है कि यह दरअसल खुशियां कम संतोष का प्रदर्शन अधिक था। कसाब तो फांसी से पहले ही मर चुका था। उसके होने को पाकिस्तान नकार चुका था। उसके परिवार वालों ने भी उससे रिश्ता तोड़ ही लिया था। जिन लोगों को कसाब ने अपने साथियों के साथ मिलकर मारा, उनके परिजन कसाब की लाश को कल्पना में कितनी ही बार उकेर चुके होंगे। फांसी तो समापन था उन औपचारिकताओं का, जिनपर हमारे देश के करोड़ों रूपये खर्च हो रहे थे। एक पंेडिंग काम खतम होने की खानापूर्ति ही थी कसाब को फांसी पर लटका दिया जाना।
परन्तु कसाब को फांसी पर लटका देने से हमारे देश की ईज्जत तो नहीं ही बढ़ी। जिस कसाब ने खुले आम निर्दोष लोगों को जेहाद के नाम पर मारा, उसे हमने न्यायिक प्रक्रिया के उपरान्त भी डरते हुए, चोरी छिपे फांसी दी। उसने कु्ररता को खुले आम अंजाम दिया और हमने मानवता के हक में न्यायिक प्रक्रिया को भी डर कर पूरा किया। आखिर क्यों? किसका डर था हमें? क्या हमने विश्व के सामने भारत के नेताओं के मन में छिपे डर को ही उजागर नहीं किया? फिर कसाब की कब्र बनाना? हद है हमारे देश के नेताओं के मूर्खता की।
 22/11/2012

Saturday, February 25, 2012

सोमालिया में बसते एलियन


हमारे वैज्ञानिकों को पृत्वी के पास ही एक ऐसा ग्रह मिल गया है, जिसपर पानी मिला है। हमारे वैज्ञानिक उत्साहित हैं क्योंकि वहंा पर वह जीवन की संभावनाएं तलाश सकते हैं। वह देखना चाहते हैं कि परग्रही आखिर किस प्रकार के दिखते होंगे। यदि वास्तव में वहां पर परग्रही मिलते हैं तो हम भी उन्हें देखना चाहेंगे।
परन्तु जब भी ऐसी कोई खबर आती है तो मुझे पृथ्वी पर ही रहने वाले ऐसे मानवों के बारे में ख्याल आ जाता है जो यदि हमारे सामने अचानक आ जाऐं तो हम चौंक जाएं। शायद हम उन्हें एलियन ही मान लें। सोमालिया में शायद ऐसे लोग हैं। भूख ने उनकी हड्डी पर से मांस की आखिरी परत भी सोख ली है। इन्टरनेट पर ऐसी कितनी तस्वीरें मिल जाएंगी, जिन्हें देख कर कलेजा चाक-चाक हो जाता है। कल्पना करता हूं उन मांओं की आंखों और आत्मा में छिपे दर्द की जो कि अपने उस बच्चे को तिल-तिल मरते देखती होगी, जो पैदा होने के बाद शायद ही कभी हंसा हो। मैं नहीं कहता कि हमारे वैज्ञानिक कुछ गलत काम कर रहे हैं, परन्तु एलियन को देखने की भूख लिए इन वैज्ञानिकों और विश्व के सत्ताधीशों को यदि इन भूखे कंकालों के सामने खड़ा कर दिया जाए तो...?
वैज्ञानिकों को बधाई परन्तु हमारे पृथ्वी पर रहने वाले ऐसे लोगों को कैसे सांत्वना दूं जो पृथ्वी पर बिछे पत्थरों की दरारों में रोटी की आस लिए जमींदोज होते जा रहे हैं।