Saturday, August 20, 2011

स्वतन्त्रता संग्राम का अधूरा भाग पूरा करने का समय


आज से पूर्व कभी मन में यह प्रश्न आता था कि क्या हमारा देश कभी भ्रष्टाचार से मुक्त हो सकता है तो उसका उत्तर नकारात्मक ही मिलता था। हकीकतन मन में कभी आशा ही नहीं जागी कि हम अपने देश को भ्रष्टाचार से विहीन कर पाएंगे। कारण साफ था। देश को चलाने वाले संख्या में कम होकर भी अरबों का घोटाला हर साल कर जाते हैं। इधर आम जनता के वाशिन्दे जो चपरासी से लेकर आई ए एस ऑफिसर के रूप में सरकारी दामाद बने हैं, वे भी हर तरीके से भ्रष्टाचार में लिप्त हुए पड़े हैं। व्यापारी वर्ग, जिसे हम आम आदमी के रूप में दुकानों को चलाते देखते हैं, वे भी किसी न किसी तरीके से गरीबों को लूटने में व्यस्त हैं। समाज के सभी वर्ग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। यह भ्रष्टाचार भले ही छोटी राशि का करते हैं, परन्तु संख्या में अधिक होने के कारण हर वर्ष अरबों का घोटाला यह भी कर जाते हैं। सिर्फ वह वर्ग भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं है जो किसी भी तरीके से भ्रष्टाचार नहीं कर सकता और दूसरा वह...जो कि वास्तव में हमारे देश की रीढ़ है...ईमानदार और सच्चे लोग। हालांकि इनकी संख्या बहुत कम है पर फिर भी इतनी तो अवश्य है कि वह कभी कभार हमारे मन में देश के प्रति सम्मान जगा जाते हैं। हालांकि इस सबके बावजूद भ्रष्टाचार में स्वेच्छा से लिप्त तथा मजबूरी में भ्रष्टाचार का साथ देने वाले सभी लोगों के मन में भ्रष्टाचार के प्रति नफरत का भाव अवश्य है। परन्तु इस नफरत के भाव, विरोध को जुबान नहीं थी। अन्ना हजारे ने इस विरोध को जुबान दे दी है। भले ही वह जनलोकपाल बिल अभी नहीं बनवा पाए हों, परन्तु यह एक सफलता तो अवश्य उनके खाते में जाती है। जनलोकपाल बिल से अधिक जरूरी काम था देश की निराश जनता की आकांछा को जुबान देना। उन्हें सोते से जगाना, उनमें आशा जगाना। इसके लिए अन्ना को दिल से साधुवाद।
रही जनलोकपाल बिल को विधान बनाने की बात तो अब वह काम सारे देश का है। जो भ्रष्टाचार के शिकार है, उनका भी तथा जो भ्रष्टाचार में शामिल हैं, उनका भी। भ्रष्टाचारी भी यह जान ले कि वह भ्रष्टाचार करके कहीं से पैसा कमा भले ही ले, परन्तु वह भी कहीं पर भ्रष्टाचार का शिकार होगा तो यह सारी कमाई उधर निकल जाएगी। बेहतर है वह भ्रष्टाचार को खतम करने में अपना योगदान दे।
और हम...जो अन्ना के साथ जुड़े हैं अथवा घरों में बैठे उन्हें मेरी तरह साधुवाद दे रहे हैं, को चाहिए कि देशभर में चल रहे तमाम आंदोलनों में कम से कम एक आंदोलन में तो अवश्य शामिल हो। अपना कुछ तो योगदान दे देश को खुशहाल और गौरवमयी बनाने में।
1947 में हमारा देश आजाद तो हो गया था परन्तु आजादी अपूर्ण थी। अपूर्ण आजादी से पूर्ण आजादी का काम 16 अगस्त से शुरू हो गया है। भले ही 64 साल देरी से परन्तु 15 अगस्त के अगले दिन से ही। हमने पहले वाले स्वतन्त्रता संग्राम में तो हिस्सा नहीं लिया, परन्तु इस आंदोलन में अवश्य हिस्सा लें। जय हिन्द!

Sunday, June 5, 2011

बाबा रामदेव...ऐसा क्यों?

प्रसिद्धि की चाहत शायद मानव मन के सबसे भीतरी परत पर लिपटी सोने के वर्क की तरह है, जो अपनी चमक सबके सामने लाना चाहती है। तभी तो वह मानव शरीर से स्वयं तक की सारी भाव परतों को प्रभावित करती हुई महत्वकांछाओं के रूप में प्रगट होती है। बाबा रामदेव भी इस भीतरी परत के सोने की चमक से चकाचौंध हो गए। उन्होंने मुद्दा तो सही उठाया परन्तु इस कार्य में उनकी व्यक्तिगत महत्वकांछाएं कहीं अधिक भूमिका अदा कर रही थी। सोचिए यदि सरकार उनसे तथा उनके समर्थकों से जोर-जबरदस्ती नहीं करती तो बाबा रामदेव के पास बोलने के लिए क्या रहना था? कुछ नहीं।

Saturday, June 4, 2011

मुकेश अम्बानी और मैं



मुकेश अम्बानी के साथ मेरी तुलना किसी को भी अजीब लगेगी। परन्तु एक दिन बस में बैठे-बैठे मैंने विचार किया और स्वतः ही उनसे अपनी तुलना करने लगा। तुलना के दौरान जो बातें सामने आईं, उसने मुझे संतोष दिया। मुझे पता चला कि मैं मुकेश अम्बानी से कहीं अधिक खुशनसीब व्यक्ति हूं।
कैसे...? इसके पहले मैं बता दूं कि सुखी होना और खुश होने में फर्क होता है। निश्चित ही मुकेश अम्बानी मेरे से अधिक सुखी इन्सान हैं, परन्तु क्या मुझसे अधिक खुश व्यक्ति भी हैं? क्या मुझसे अधिक खुशनसीब भी हैं? नहीं... एक बात सोच कर देखिए। हम दोनों में से किसके पास खुश होने के अवसर अधिक हैं? मुकेश किस अवसर पर खुश होते होंगे? वह खुशी जो क्षणिक भले ही हो, परन्तु वास्तविक हो। हमें सोचना पड़ेगा कि मुकेश अम्बानी कब-कब खुश हो सकते होंगे। महंगा हवाई जहाज खरीद कर भी वह खुश तो नहीं होते होंगे। हां, यदि अपने किसी रिश्तेदार को वह हवाई जहाज भेंट करें और वह खुश हो जाए, तो उसकी खुशी से वह अवश्य खुश हो जाएंगे। यानि खुशी हवाई जहाज से नहीं, अपने किसी अजीज की खुशी से आती है। उनके अजीज भी कब-कब खुश होते होंगे? किसी मकान को खरीदने से, किसी कार को खरीदने से या किसी अन्य ऐसी ही चीज से? नहीं...यह सब उनके लिए अतिसामान्य बातें हैं। इनसे वह खुश तो नहीं होते होंगे। यह उनके लिए दिनचर्या समान है। हमें बहुत सोचना पड़ता होगा कि वह कब-कब खुश होते होंगे। परन्तु जरा आप मेरे बारे में सोच कर देखें। मैं मध्यम आयवर्ग का सामान्य सा सरकारी नौकर हूं। मैं बहुत से अवसरों पर खुश होता हूं और हो सकता हूं। मेरी बस छुट गई और किसी जानकार ने लिफ्ट दे दी...मैं खुश। कोई पुराना साथी अचानक मिल गया...मैं खुश। मेरी पसन्द की केाई किताब मुझे किसी ने दे दी...मैं खुश। मेरे बच्चे के अच्छे नम्बर गए...मैं खुश। मेरी कविता की किसी ने प्रसंशा कर दी...मैं बहुुत खुश। यहां तक कि मेरे पसन्द की सब्जी बन गई तो भी मैं खुश। गिनती करें तो करते रह जाएंगे...इतने मौके हैं मेरी खुशी के। मेरे पास खुश रहने के हजारों अवसर हैं और मुकेश अम्बानी के पास...? निश्चित ही इतने नहीं हैं। तो कौन है खुशनसीब। उनके पास सुख के सब साधन हैं परन्तु खुश रहने के साधन नहीं। खुश रहने का साधन होता है हमारे भावों में आया प्रसन्नता का आवेग। जो कि मुकेश के पास कम ही आता होगा।
...तो बताईये...कौन है अधिक खुश...अधिक खुशनसीब? मैं ...