Thursday, May 28, 2020

 हालात कह रहे हैं कि हममें इन्सानियत नहीं रही।

त्रासदियां दो प्रकार की कही जा सकती हैं। एक प्राकृतिक और मानवजनित। कोरोना यदि चीन के लैब से निकला है तो यह मानवजनित त्रासदी होगी परन्तु जब तक यह प्रमाणित नहीं हो जाता हम इसे प्राकृतिक ही मानते हैं।
इस काल में मानवजनित एक त्रासदी हमें हमारे देश में देखने को मिली है। ऐसी त्रासदी दुनिया के किसी कोने में नहीं सुनने को मिली। यह त्रासदी है हमारे देश के कामगार मजदूरों का विस्थापन और उसपर राजनीति। जब देश के मजदूर लाॅकडाऊन में काम नहीं होने की स्थिति में अपने अपने गांव जाने के लिए पैदल, साईकिलों पर निकलने लगे तब दुनिया को पता चला कि यह लाखों नहीं करोड़ों लोग हैं जो बिहार और यूपी के साथ अन्य राज्यों से पूरे देश में फैले हुए हैं और मानवश्रम हासिल करा रहे हैं। देश की हर सड़क, देश का हर भवन, देश का हर सामान, खेती सभी कुछ इन्हीं श्रमिकों के पतले पर मजबूत हाथों से बना हुआ है। गरीबी, भूख और बेरोजगारी के चलते यह मजदूर वर्ग सिर्फ यह चाहता था कि वह अपने घर पहुंच जाए। इसपर पूरे देश में राजनीति चल पड़ी। हमारे देश की सत्ता ने एक बार भी इन मजदूरों के बारे में न तो सोचा न ही कुछ बोला। वरन् यह तो मजदूरों के साथ सत्ता का मजाक तक कहा जा सकता है जब किसी बिल्डिंग एसोसियेशन या धनिकों के अन्य संगठनों के कहने पर उन्होंने मजदूरों को अपने कार्यस्थल पर रूकने तक के लिए मजबूर कर दिया गया। अर्थात् धनिकों के कहने पर मजदूर को किसी भी हद तक नष्ट किया जा सकता है। ऐसे में फिर भी यदि सरकार खुद को जनहित का साबित करने की कोशिश करे तो शर्म से सिर ही झुक सकता है।
कितने उदाहरण हम देखेंगे। यू ट्यूब भरी पड़ी है ऐसे उदाहरणों से जिसमें सड़क पर चलते लोग भूख, गर्मी, थकान और पुलिस के डंडों से मर रहे हैं। किराए के घरों से निकाल दिए गए ये मजदूर कहीं के नहीं रहे। रही सही कसर रेल्वे ने पूरी कर दी। कहीं को जाने वाली रेल कहां पहुंच रही है। इस दौर में भारतीय रेल्वे के लिए यह कहावत पूरी तरह खरी उतरती है, ‘जाना था जापान पहुंच गए चीन।’ पर वो भी कितने दिन में। एक दिन में जहां पहुंच जाना चाहिए था वहां तीन तीन दिन लग रहे हैं और वह भी बिना खाना पानी के। रेल में ही भूखे, प्यासे होकर मजदूर मर रहे हैं। किसी की मां मर गई, किसी का भाई, किसी का पति। जो बच रहा है पुलिस उसे डंडे मार कर बता रही है कि हमारे देश की सरकार उनके बारे में कितनी संवेदनशील है।
इन्सानियत पर इससे बड़ी कु्ररता नहीं कही जा सकती तिसपर सरकारें अपनी पीठ ठोक रही हैं।
अब मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के एक वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। करोड़ों घरों तक प्रधानमंत्री जी अपनी चिठ्ठी पहुंचाएंगे। इस काम के लिए उनके पास लाखों लोग हैं, परन्तु सड़क पर तिल तिल कर मरते गरीबों के लिए उनके पास एक कार्यकर्ता तक नहीं। चुनावों में हजारों बसें मुफ्त में चलाने तमाम राजनीतिक दलों के पास आज एक भी बस नहीं। हैरानी है कि एक भी नेता का खासकर हमारे प्रधानमंत्री का दिल नहीं पसीजता लोगों को यंू बिलख बिलखकर मरते देख।
मुझे लगता है यह पूरे भारतवर्ष के इतिहास में यह सबसे काला अध्याय है कि गरीब इन्सान एड़ियां रगड़कर मरे और प्रजातांत्रिक सरकारें अपनी पीठ ठोकती रहीं।
लानत!