आज जब कि समस्त मानव वर्ग एक-दूसरे पर कमोबेश निर्भर हैं, दुआ करिए कि नये वर्ष पर सभी के मन में सकारात्मक विचार बनें और सभी एक-दूसरे से प्रेम बनाएं, प्रेम बढ़ाएं। शेष बातें इसके बाद हैं और ऐसा होने पर वह स्वतः ही सुधर जाती हैं। नया वर्ष 2011 सबके लिए मंगलमय, प्रेममय, शांतिमय हो।
Friday, December 31, 2010
Saturday, December 25, 2010
भ्रष्टाचार और आम आदमी
जब कभी आपको किसी बात पर बहुत अधिक क्रोध आए और आप कुछ भी नहीं कर सकते हों तो आप क्या करना चाहेंगे? शायद आप भगवान से प्रार्थना करना चाहेंगे अथवा अपने बाल नोचना चाहेंगें? यह इसपर भी निर्भर करता है कि आपको मजबूर करने वाला किस तरह का व्यक्ति है? यदि वह व्यक्ति हद दर्जे का कमीना हो, स्वार्थी हो आपका पैसा हड़प करने वाला हो और इसके बावजूद भी स्वयं को आपका हितैषी कहे तो आप उसके साथ क्या करना चाहेंगे? ...मैं अन्दाजा लगा सकता हूं आप उसके साथ क्या करना चाहेंगे। अब जरा यह सोचिए कि ए.राजा ने, जिसने 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले में देश के करदाताओं का सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए एक लाख पिचहत्तर हजार करोड़ रूपया यानि 17 खरब 50 अरब रूपया खा लिया हो और स्वयं को देशप्रेमी कहे तो आप उसके साथ क्या-क्या करना चाहेंगें?
भ्रष्टाचार पर वैसे तो बहुत बार दुखी हुआ हूं मैं, पर पहली बार मेरा मन किया कि मैं पागल होकर चिल्लाता हुआ प्रधानमंत्री के आगे आत्मदाह कर हूं। इसके बाद भी यदि क्रोध खतम न हुआ तो देश की हालत पर शर्मिंदा होकर बार-बार मरना चाहूंगां। परन्तु पता है कि इससे भी हमारे प्रधानमंत्री और ए.राजा जैसे नराधम को शर्म नहीं आएगी।
पर मेरे पास तो और कुछ नहीं करने को....।
आप बताएं है कुछ करने को मेरे पास? यदि हां तो मैं शांत क्यों हूं? आप शांत क्यों हैं?
भ्रष्टाचार पर वैसे तो बहुत बार दुखी हुआ हूं मैं, पर पहली बार मेरा मन किया कि मैं पागल होकर चिल्लाता हुआ प्रधानमंत्री के आगे आत्मदाह कर हूं। इसके बाद भी यदि क्रोध खतम न हुआ तो देश की हालत पर शर्मिंदा होकर बार-बार मरना चाहूंगां। परन्तु पता है कि इससे भी हमारे प्रधानमंत्री और ए.राजा जैसे नराधम को शर्म नहीं आएगी।
पर मेरे पास तो और कुछ नहीं करने को....।
आप बताएं है कुछ करने को मेरे पास? यदि हां तो मैं शांत क्यों हूं? आप शांत क्यों हैं?
Thursday, November 11, 2010
भारत या ‘इंडिया दैट इज भारत’
मेरे मन में एक बहस बहुत बार चल चुकी है। एक बात मुझे वर्षों सेे खटकती है कि क्या हमारे देश का संवैधानिक नाम ‘इंडिया दैट इज भारत’ उचित है? क्या इस नाम से हमारे देश की स्वाधीनता दागदार नहीं दिखती? क्या यह नाम एक स्वयंभू राष्ट्र का नाम प्रतीत होता है? इंडिया किसके लिये? फिर दैट इज भारत? हम किसे बताना चाहते हैं कि ‘ इंडिया वह जो कि भारत है।’ आखिर किसी देश का ऐसा नाम हो सकता है जो अपने नाम में स्वयं के प्रति शंका उत्पन्न करता है?
क्या ऐसे नाम को बदलने के लिए एक मुहिम नहीं चलाई जानी चाहिए? यदि हां तो मैं निवेदन करूंगा कि आप अपने विचार दें जो मार्ग प्रशस्त कर सकें हमारे देश की स्वाधीनता को बेदाग करने के लिए। आपके विचार एक दस्तावेज बन जाएंगे और शायद इतिहास रच सकें।
पुनश्चः जब शहरों तथा राज्यों के नाम राजनीतिक कारणों से भी परिवर्तित किए जा सकते हैं तो राष्ट्रधर्मिता के लिए, देश के स्वाभिमान के लिए देश का गलत तथा परायों द्वारा थोपा गया नाम क्यों नहीं बदला जा सकता?
Sunday, November 7, 2010
आस्तिक या नास्तिक
कुछ दिनों पूर्व मेरी दो ऐसे लेखकों से मुलाकात हुई जो स्वयं को नास्तिक कहते हैं। दोनों बुजूर्ग हैं तथा लगभग 25 वर्षों से वे परमात्मा को नहीं मानते। मेरे लिए यह पहला अवसर था जब मैंने परमात्मा को नहीं मानने वालों के तर्क सुने। वे तर्कशील सोसायटी से भी जुड़े हैं। मुझे लगता था कि नास्तिक होने से इन्सान अपनी अच्छाईयों तथा बुराईयों को परिभाषित नहीं कर पाता होगा। यह भी लगता था कि नास्तिक व्यक्ति के स्वभाव में एक प्रकार का अक्खड़पन भी होता होगा। परन्तु दोनों व्यक्तियों में ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। दोनों बहुत ही कोमल स्वभाव के व्यक्ति हैं। दोनों के मन में मैंने दूसरों के लिए बहुत सम्मान-भाव देखा। मुझे नहंी पता कि वे दुखी होने पर स्वयं के मन को कैसे सम्हालते होंगे, परन्तु मैंने उन दोनों के चेहरे पर एक प्रकार का संतोष देखा। यह मेरे लिए आश्चर्य की बात है। हालांकि मैंने जब उनसे कहा कि परमात्मा की उपस्थिति का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण न होने से आप परमात्मा को नहीं मानते तो भावनाएं भी कहीं नहीं दिखतीं। उनकी भी उपस्थिति को आप प्रमाणित नहीं कर सकते परन्तु आप मानते हैं कि भावनाएं सारी दुनिया चलाती हैं। यह विरोधाभास क्यों? इसका उनके पास जो उत्तर था, वह मुझे स्वीकार नहीं था। हमारी वार्ता अधूरी रही, चूंकि यह अपने आप में बहुत विस्तृत विषय है। पता नहीं, आप सब क्या सोचते हैं। मैं परमात्मा को मानना नहीं छोड़ सकता, परन्तु इन दोनों से मिलकर मुझे लगा कि नास्तिकों के तर्क को आजमाने के लिए हमें उन्हें समझना जरूरी है। पर उनसे तर्क करने से पहले हम स्वयं को टटोलें कि क्या कभी-कभी हमें भी यह नहीं लगता कि परमात्मा संभवतः नहीं भी हो सकता है। वरना मासूमों का मांओं के सामने कत्ल, परिवार के सामने स्त्रियों की लूटती आबरू, यह सब क्या परमात्मा को हिला नहीं डालती होंगी? अगर सच्ची प्रार्थना परमात्मा अवश्य सुनता है तो ऐसे अवसरों पर पीड़ितों की आत्मा से निकली प्रार्थना का क्या होता है? इससे सच्ची प्रार्थना और क्या होती होगी?
Tuesday, October 12, 2010
साहित्य की नई विधा
साहित्य की कई विधाओं में एक अन्य विधा को शामिल किया जाना चाहिए। उस विधा का नाम है सम्पर्क। दरअसल मैंने महसूस किया है कि मात्र साहित्य लिखने से आप चर्चित नहीं हो जाते। साहित्यकारों के सम्पर्क में आने से आपका साहित्य चर्चा पाता है। भले ही आप राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हों, परन्तु आम आदमी आपको नहीं जानता। साहित्यकार भी आपके नाम को नोटिस में नहीं लेते। इससे क्या यह तथ्य सामने नहीं आता कि आम आदमी के साथ साहित्यकारों को भी साहित्य से विशेष लेना-देना नहीं होता। हां, यदि साहित्यकार जानकार है, आपके सम्पर्क में है तो उसका साहित्य स्वीकारा जाता है। ऐसे में साहित्य क्या ठगा नहीं जा रहा?
Sunday, September 5, 2010
मेरी पहली किताब
मेरा पहला कहानी संग्रह आज मेरे हाथों में आया। सोचा था कि अपनी पहली किताब को हाथ में लेने का रोमांच कुछ अलग ही महसूस होगा परन्तु ऐसा नहीं हुआ। आदरणीय मोहन जी सपरा के साथ किताब के निर्माण में शुरू से जुड़ा रहा, प्रकाशन का हिस्सा बन कर, इसलिए वह रोमांच अपने आप ही खतम हो गया। परन्तु किताब के निर्माण में जुड़े होने से जो हासिल हुआ, वह उस रोमांच से कुछ अधिक महत्वपूर्ण था। इसलिए अच्छा लगा।
किताब तो आ गई। अब इस रोमांच या सुख में हस्तक्षेप की बात कहंा पर रह जाती है?
मैंने किताब के लेखकीय में जिन दो लोगों को धन्यवाद नहीं दिया वे हैं मेरी पत्नी निशा तथा मेरा बेटा भारत। मैंने इनके हिस्से का समय इस किताब को दिया। क्या यह उचित था? किताब के लिए शायद उचित होगा परन्तु इनके लिए? कदापि नहीं! उनके हिस्से के सुख से यह किताब लिखी गई और किताब में उनका जिक्र भी नहीं। मैं शर्मिन्दा हूं। कोई भी लेखक जब कोई कृति करता है, तो उसपर पहला हक उनका होता है, जिनके हिस्से के समय से वह कृति रची गई है। उनके ऋण से मुक्त होना बहुत मुश्किल है।
किताब तो आ गई। अब इस रोमांच या सुख में हस्तक्षेप की बात कहंा पर रह जाती है?
मैंने किताब के लेखकीय में जिन दो लोगों को धन्यवाद नहीं दिया वे हैं मेरी पत्नी निशा तथा मेरा बेटा भारत। मैंने इनके हिस्से का समय इस किताब को दिया। क्या यह उचित था? किताब के लिए शायद उचित होगा परन्तु इनके लिए? कदापि नहीं! उनके हिस्से के सुख से यह किताब लिखी गई और किताब में उनका जिक्र भी नहीं। मैं शर्मिन्दा हूं। कोई भी लेखक जब कोई कृति करता है, तो उसपर पहला हक उनका होता है, जिनके हिस्से के समय से वह कृति रची गई है। उनके ऋण से मुक्त होना बहुत मुश्किल है।
Wednesday, September 1, 2010
एक सबक
मेरी उस संस्था को एक साल से अधिक हो गया है, जिसे मैंने स्थापित किया था। परन्तु एक साल बाद ही मैं मेरी संस्था से हटा दिया। क्या कारण मेरे साथियों का बना गुट था अथवा मेरा अधिक आदर्शवादी होना? अथवा फिर मेरा हर किसी के लिए पूर्ण रूप से सहज हो जाना। मैं समझ नहीं पाया था कि किसी संस्था में निरपेक्ष लोगों का होना बहुत लाजमी है। मेरे साथ जो दोस्त जुड़े, उनका आपस में एक गुट था। वे सक्रिय थे परन्तु वे चाहते थे कि वे अपने काम को ऐेसे अंजाम दें मानो कुछ दोस्त मिलकर काम कर रहे हों। मैं उनका दोस्त नहीं था। जाहिर है इसलिए मैं उनके बीच तब उपेक्षित हो गया जब उन्होंने सारे कामों को, जिनमें फैसले लेने शामिल थे, सम्हाल लिया। मैं प्रारम्भ से ही अपने दोस्तों के फैसलों को स्वीकार करता रहा था। परिणाम अजीब रहा। वे मेरी उपस्थिति कम से कम चाहने लगे। फिर हमारे मध्य एक ऐसा सदस्य आया, जो जरूरत से अधिक मैच्योर था। ऐसे लोग दूसरों का मजाक उड़ाने लगते हैं। मैंने अपने दोस्तों के रूख को सहज स्वीकार किया और अलग होना चाहा। परन्तु यह भी मेरे साथियों को स्वीकार नहीं था। शायद इसलिए कि फिर विवादास्पद फैसलों में किसका नाम लिया जाएगा। या फिर शायद यह कारण रहा कि वे मेरे प्रभाव से जुड़े मेरे कुछ साथियों के प्रश्नों से बचना चाहते थे।
मैं आज स्वयं को अपनी ही संस्था से पूरी तरह विमुख पाता हूं। मैंने अपनी प्रथम किताब के अन्तिम पृष्ठ पर स्वयं को अपनी संस्था का संस्थापक अध्यक्ष लिखा तो है परन्तु मैं जानता हूं कि मेरे साथियों को शायद यह भी पसन्द नहीं आएगा।
मैंने अपनी जिन्दगी का सबक लिया है कि किसी संस्था को शुरू करते समय किसी एक गुट को उसमें शिरकत मत करने दो। संस्था के लिए यह कदापि उचित नहीं हो सकता।
परन्तु क्या इसमें मेरी कमी नहीं रही होगी? यदि मेरे साथी मेरे से नहीं जुड़ सके तो कुछ तो कमी मेरे में थी ही। हालांकि इस समय मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर क्या कमी रही थी मेरे में-शायद आगे कभी मैं महसूस कर सकूं अपनी कमी को।
मैं आज स्वयं को अपनी ही संस्था से पूरी तरह विमुख पाता हूं। मैंने अपनी प्रथम किताब के अन्तिम पृष्ठ पर स्वयं को अपनी संस्था का संस्थापक अध्यक्ष लिखा तो है परन्तु मैं जानता हूं कि मेरे साथियों को शायद यह भी पसन्द नहीं आएगा।
मैंने अपनी जिन्दगी का सबक लिया है कि किसी संस्था को शुरू करते समय किसी एक गुट को उसमें शिरकत मत करने दो। संस्था के लिए यह कदापि उचित नहीं हो सकता।
परन्तु क्या इसमें मेरी कमी नहीं रही होगी? यदि मेरे साथी मेरे से नहीं जुड़ सके तो कुछ तो कमी मेरे में थी ही। हालांकि इस समय मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर क्या कमी रही थी मेरे में-शायद आगे कभी मैं महसूस कर सकूं अपनी कमी को।
Monday, August 30, 2010
हस्तक्षेप क्यों?
हस्तक्षेप-हमारे मन के भीतरी परतों में-उन बातों में, जिनके बारे में हम सोचने से डरते हैं। हस्तक्षेप-हमारे विचारों के अनसुलझे पहलूओं की दुनिया में। भले ही हम बेबाक कह न सकें, परन्तु बेबाक होकर हम अपने विचारों पर विचार करें।
लिख सकते हैं तो लिखिये, पर साहस होना चाहिए।
एक प्रश्न देता हूं। हम अपनी सौ गलतियों को भी माफ करते हैं, परन्तु दूसरे की एक गलती को भी माफ क्यों नहीं कर पाते-चाहते हुए भी।
लिख सकते हैं तो लिखिये, पर साहस होना चाहिए।
एक प्रश्न देता हूं। हम अपनी सौ गलतियों को भी माफ करते हैं, परन्तु दूसरे की एक गलती को भी माफ क्यों नहीं कर पाते-चाहते हुए भी।
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