Thursday, May 28, 2020

 हालात कह रहे हैं कि हममें इन्सानियत नहीं रही।

त्रासदियां दो प्रकार की कही जा सकती हैं। एक प्राकृतिक और मानवजनित। कोरोना यदि चीन के लैब से निकला है तो यह मानवजनित त्रासदी होगी परन्तु जब तक यह प्रमाणित नहीं हो जाता हम इसे प्राकृतिक ही मानते हैं।
इस काल में मानवजनित एक त्रासदी हमें हमारे देश में देखने को मिली है। ऐसी त्रासदी दुनिया के किसी कोने में नहीं सुनने को मिली। यह त्रासदी है हमारे देश के कामगार मजदूरों का विस्थापन और उसपर राजनीति। जब देश के मजदूर लाॅकडाऊन में काम नहीं होने की स्थिति में अपने अपने गांव जाने के लिए पैदल, साईकिलों पर निकलने लगे तब दुनिया को पता चला कि यह लाखों नहीं करोड़ों लोग हैं जो बिहार और यूपी के साथ अन्य राज्यों से पूरे देश में फैले हुए हैं और मानवश्रम हासिल करा रहे हैं। देश की हर सड़क, देश का हर भवन, देश का हर सामान, खेती सभी कुछ इन्हीं श्रमिकों के पतले पर मजबूत हाथों से बना हुआ है। गरीबी, भूख और बेरोजगारी के चलते यह मजदूर वर्ग सिर्फ यह चाहता था कि वह अपने घर पहुंच जाए। इसपर पूरे देश में राजनीति चल पड़ी। हमारे देश की सत्ता ने एक बार भी इन मजदूरों के बारे में न तो सोचा न ही कुछ बोला। वरन् यह तो मजदूरों के साथ सत्ता का मजाक तक कहा जा सकता है जब किसी बिल्डिंग एसोसियेशन या धनिकों के अन्य संगठनों के कहने पर उन्होंने मजदूरों को अपने कार्यस्थल पर रूकने तक के लिए मजबूर कर दिया गया। अर्थात् धनिकों के कहने पर मजदूर को किसी भी हद तक नष्ट किया जा सकता है। ऐसे में फिर भी यदि सरकार खुद को जनहित का साबित करने की कोशिश करे तो शर्म से सिर ही झुक सकता है।
कितने उदाहरण हम देखेंगे। यू ट्यूब भरी पड़ी है ऐसे उदाहरणों से जिसमें सड़क पर चलते लोग भूख, गर्मी, थकान और पुलिस के डंडों से मर रहे हैं। किराए के घरों से निकाल दिए गए ये मजदूर कहीं के नहीं रहे। रही सही कसर रेल्वे ने पूरी कर दी। कहीं को जाने वाली रेल कहां पहुंच रही है। इस दौर में भारतीय रेल्वे के लिए यह कहावत पूरी तरह खरी उतरती है, ‘जाना था जापान पहुंच गए चीन।’ पर वो भी कितने दिन में। एक दिन में जहां पहुंच जाना चाहिए था वहां तीन तीन दिन लग रहे हैं और वह भी बिना खाना पानी के। रेल में ही भूखे, प्यासे होकर मजदूर मर रहे हैं। किसी की मां मर गई, किसी का भाई, किसी का पति। जो बच रहा है पुलिस उसे डंडे मार कर बता रही है कि हमारे देश की सरकार उनके बारे में कितनी संवेदनशील है।
इन्सानियत पर इससे बड़ी कु्ररता नहीं कही जा सकती तिसपर सरकारें अपनी पीठ ठोक रही हैं।
अब मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के एक वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। करोड़ों घरों तक प्रधानमंत्री जी अपनी चिठ्ठी पहुंचाएंगे। इस काम के लिए उनके पास लाखों लोग हैं, परन्तु सड़क पर तिल तिल कर मरते गरीबों के लिए उनके पास एक कार्यकर्ता तक नहीं। चुनावों में हजारों बसें मुफ्त में चलाने तमाम राजनीतिक दलों के पास आज एक भी बस नहीं। हैरानी है कि एक भी नेता का खासकर हमारे प्रधानमंत्री का दिल नहीं पसीजता लोगों को यंू बिलख बिलखकर मरते देख।
मुझे लगता है यह पूरे भारतवर्ष के इतिहास में यह सबसे काला अध्याय है कि गरीब इन्सान एड़ियां रगड़कर मरे और प्रजातांत्रिक सरकारें अपनी पीठ ठोकती रहीं।
लानत!

Thursday, April 9, 2020

कोरोना वायरस के बहानेः तीन सबक।

कोरोना वायरस महामारी एक अभूतपूर्व त्रासद घटना है, जो इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जारी है। जारी क्या है, कहना चाहिए अपने उफान पर है। एक छोटे से वायरस ने मानव को उसकी औकात बता दी है। उस मानव को जो अपने को सर्वशक्तिमान मानता आया है। जो असंख्यों जीवों के लिए बनी इस पृथ्वी को मात्र अपने लिए मान बैठा है। जिसकी अप्राकृतिक दिनचर्या और सुविधाभोगिता ने असंख्यों जीवों का जीवन खतम कर दिया है। पृथ्वी को सहेजने वाली नदियां सोख ली हैं, प्राणदायिनी हवा में जहर घोल दिया है, सुरक्षा प्रदान करने वाले ओजोन लेयर को खत्म कर दिया है। कहा जा सकता है कि अपनी सुविधाभोगिता के लिए मानव ने प्रकृति को मानवों के लायक भी नहीं छोड़ा जिसका परिणाम है प्रकृति का यह कहर। वैसे तो अनगिनत कहर मानव पर बरसे हैं, परन्तु वह किसी क्षेत्र विशेष के होने के कारण या उनका प्रत्यक्ष परिणाम बहुत कम लगने के कारण मानव ने उन्हें गंभीरता से लिया ही नहीं। अब यह कहर बरपा है जो पूरे विश्व पर है। गरीब से लेकर सबसे अमीर लोगों पर यह कहर बरपा है। स्वयं को सुरक्षित महलों में रखने वाले भी इसकी चपेट में आए हैं। कल्पना करें, यदि यह कहर मात्र गरीबों पर बरपा होता तो क्या होता? निश्चित ही दुनिया के बड़े लोगों के लिए यह कोई समस्या नहीं होती। व्यापारी लोग उसमें अपना बाजार खोजने लग जाते। नेताओं के लिए वह राजनीति का एजेंडा होता, जिसके वह चिन्तित दिखते पर वास्तव में होते नहीं। पर चूंकि यह वायरस किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करता, इसलिए विश्व के सबसे ताकतवर भी परेशान हैं। प्रकृति, सत्ता और ताकत को वह अपने पक्ष में हमेशा झुकाते आए हैं, इस वायरस ने उनमें खलबली मचा दी है।
यह दौर कब तक चलेगा, निश्चित नहीं कहा जा सकता। परन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि मानव अपनी स्वार्थपरता के बावजूद सबसे अधिक जीजिविषा वाला जीव है। पिछले तमाम महामारियों से वह बहुत नुकसान के बाद ही सही, पर जीता है। इससे भी जीतेगा। जीतना भी चाहिए परन्तु...।
आप आज की स्थिति देखें या उस स्थिति की कल्पना अभी कर लें जब कोरोना कोविड 19 की दवा ईजाद कर ली जाएगी, जैसी कि पूर्व की महामारियों यथा चेचक, मलेरिया, हैजा, प्लेग इत्यादि की खोज ली गई है। तीन चीजें उभर कर सामने आती हैं। इसे आप सबक मान लें या फिर चोट। परन्तु यह तीन चीजें पहले से हमारे सामने आनी चाहिए थीं। यदि आई भी हैं तो हमने कभी उसे महत्व नहीं दिया।
यह तीन चीजें क्या हैं?
पहली, मानव के लिए सबसे जरूरी है चिकित्सा सुविधाएं। यह मानव के लिए विज्ञान का सबसे बड़ा विषय होना चाहिए।
हमें बिना किसी भेदभाव के चिकित्सा सुविधाएं हर व्यक्ति तक पहुंचानी चाहिएं। स्थिति वास्तव में यह है कि अमीरों के लिए हर प्रकार की चिकित्सा सुविधा है जबकि गरीबों के लिए किसी भी गंभीर बीमारी का ईलाज मात्र मौत है। विभिन्न देशों में हर नागरिकों को चिकित्सा सुविधा समान रूप से उपलब्ध है, परन्तु ऐसे देश बहुत कम हैं। भारत जैसे देश में तो तमाम दुहाईयों के बाद भी गरीब अनसुना रह जाता है और उसकी मौत पर देश के सिस्टम का एक हिस्सा भी खुद को जिम्मेवार नहीं मानता। कोरोना वायरस ने बिना भेदभाव के अमीर गरीब सभी को अपना शिकार बनाया है। इसे एक संदेश के रूप में लेना चाहिए कि भेदभाव मानव भी खत्म कर दे।
इसके साथ ही चिकित्सा क्षेत्र में नये नये अनुसंधान होते रहने चाहिएं। चिकित्सा क्षेत्र को बाजार से संचालित किए जाने के बजाय सेवा से संचालित करना जरूरी है वरना यह भेदभाव एक दिन दुनिया में नये नये रोग बनाएगा न कि दवा। आज पूरी दुनिया में मास्क, वेंटिलेटर और दवाओं की कमी सामने आ रही है। यह वक्ती तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए। हमारी सुविधाभोगी दिनचर्या ने बहुत से नये रोग सामने लाए हैं। कैंसर, एड्स, हाई बीपी, शुगर यह सब रोजाना हजारों जीवन लील लेती हैं, परन्तु इनकी चर्चा नहीं होती। क्या हम दावा कर सकते हैं कि आगे ऐसे वायरस या विषाणु और नहीं आएंगे? हमें इन सबके लिए तैयार रहना होगा। हर रोग की दवा और जरूरी उपकरण उपलब्ध करवाने होंगे और वो भी हर किसी के लिए। यह बहुत बड़ा सबक है कोरोना का। मानव इसे स्वीकार करे वरना तो राम मालिक है।
जी हां, राम मालिक है। यह वाक्य शताब्दियों से अलग अलग रूपों में हर धर्म में बोला जाता है। खुदा मेहरबान है। क्राइस्ट सबकी रक्षा करता है। सरीखे कितने ही वाक्य हमारी सोच, हमारी संस्कृति में व्याप्त हो चुके हैं। पूरी दुनिया में धर्म ऐसा विषय है जिसपर प्रश्न उठाना अपराध माना जाता है। परमात्मा को सबसे शक्तिशाली माना गया है और कहा गया है कि वह कुछ भी कर सकता है।
मैं इन सबकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता। मैं ईश्वर के बारे में बहुत कम जानता हूं, इसलिए उसे स्वीकार करने या अस्वीकार करने का ठोस दावा मैं नहीं करता। परन्तु आज के समय में संकटमोचक कौन बनकर सामने आ रहा है। विज्ञान या धर्म? मैं अध्यात्म शब्द उपयोग में नहीं ले रहा क्योंकि अध्यात्म के बहुत गहरे मायने हैं। धर्म इसी अध्यात्म का विकृत रूप है। वस्तुतः यह शब्द विकृत नहीं था। आमभाषा में सरल व्याख्याओं के रूप में अध्यात्म ही धर्म था। परन्तु धर्म को इतना विकृत किया जा चुका है कि अध्यात्म और धर्म को अब अलग कर ही दिया जाना चाहिए। सभी मंदिर बन्द हैं। मस्जिदें बन्द हैं। जहां बन्द नहीं की गईं वहां कोरोना ने और अधिक कहर बरपा दिया है। चर्च, गुरूद्वारे। सभी बन्द हैं। चिकित्सा से जुड़े लोग हमारी मदद के लिए आगे आए हैं। वह अपने पेशे के चलते ही इस कार्य में नहीं हैं, बल्कि बहुत से ऐेसे लोग जो चिकित्सा सेवा छोड़ चुके थे, सामने आकर सहायता करना चाहते हैं। मरते आदमी के लिए संक्रमण के खतरे के बावजूद डाक्टर, नर्सें काम कर रही हैं। सफाई वाले सड़कों पर आकर दिन रात सफाई कर रहे हैं। सोचिए यदि यह सामने नहीं आते तो मानव कहां जाता? मंदिर, मस्जिद तो सभी बन्द हैं, कहां जाता मानव? धर्म की व्याख्यायें करने वाले सामने ही नहीं आ रहे। अब भी मंदिर मस्जिदों के नियंता किसी प्रकार की सहायता नहीं कर रहे। सदियों से मानव इनपर जी खोलकर पैसे उछालता रहा है। बड़े मंदिरों में तो करोड़ों रूपये के सोने के छत्र दान किए जाते रहे हैं। यह दान आज कहां काम आ रहे हैं? यदि यही दान विज्ञान संस्थाओं को दिए जाते तो? सरकारी अस्पतालों को दिए जाते तो? कितने वेंटिलेटर, कितनी दवाएं, कितने मास्क, कितने अस्पताल आज इन पैसों से बन चुके होते। अनुसंधान करने वाले बगैर किसी चिन्ता के बड़े प्रयोग अपने हाथ में ले लेते। परन्तु हम यह नहीं करते।
हैरानी की बात तो तब है जब ऐसे दान या अन्धविश्वास करने के लिए किसी भी धर्म का ईश्वर नहीं कहता। वह तो उस धर्म के ठेकेदार कहते हैं। लाखों रूपये की बनी सेज पर बैठकर त्याग करने का प्रवचन देने वाले अपने ही तरीके से ईश्वर को परिभाषित करते हैं। सबसे अफसोस की बात तो तब है जब कि जनता आंख मूंदकर इनकी बात पर विश्वास भी कर लेती है। यदि हम यह मान भी लें कि ईश्वर ने मानव को बनाया है तो ईश्वर ने मानव में इतनी बुद्धि, इतना सामथ्र्य इसलिए ही तो दिया है कि वह स्वयं प्रयास करे न कि खुद हाथ पर हाथ धरकर ईश्वर से कहे कि तू ही कर।
तो दूसरा सबक यह है कि विज्ञान को धर्म से अधिक महत्व दीजिए। हो सके तो धर्म को अध्यात्म की तरफ ले जाईये। धर्म के सभी ठेकेदारों को ठोकर मारिये और विज्ञान को शक्तिशाली बनाईये। यदि कमाई के बाद आपके पास पूंजी बच रही है तो उसका कुछ हिस्सा ऐसी संस्थाओं को दीजिए जो मानवता की सेवा के लिए बनी हैं न कि अपने मालिकों की सेवा के लिए।
तीसरा सबक। और यह सबक तो बहुत पहले से मानव के सामने रखा जा रहा है, परन्तु वह माने तब तो। यह सबक है प्रकृति से खिलवाड़ नहीं करने का सबक। सही उपमा है मानव के लिए कि जिस डाल पर बैठा है, उसी को काट रहा है। प्रकृति से खिलवाड़ का ही परिणाम है कि प्रकृति के कितने ही चक्र बिगड़ चुके हैं। हर जीव हर दूसरे जीव के लिए प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से जरूरी है। एक जीवन चक्र है जो अपने वृहद्तम रूप में दर्शाता है कि पृथ्वी के इस कोने पर रहते मनुष्य के लिए दूसरे कोने पर रेंगने वाली चींटी भी लाभदायक है और उस वृहद् जीवनचक्र में अपनी महती भूमिका निभाती है, जिसे हम मानवों ने जाना है परन्तु हम उसकी परवाह नहीं करते। हमें सौ मीटर दूर जाने के लिए कार चाहिए, हमें एसी चला कर छोड़ देते हैं कि कमरा हर वक्त ठंडा मिले, भले ही हमें उसकी जरूरत पूरे दिन में पांच मिनट हो। हमें महंगे फोन चाहिएं भले ही उसके लिए कितने धातु जमीन के गर्भ से निकालकर जमीन को खोखला किया जाता हो। इस समय विश्व का पूरा बाजार तीस प्रतिशत जरूरत की चीजों से और सत्तर प्रतिशत विलासिता और आरामतलबी की चीजों से अटा पड़ा है।
कोरोना के दौरान लाॅकडाऊन के परिदृश्य को देखिये। अगर दिहाड़ी मजदूरों की बात छोड़ दें तो बाकी आम जन की कौन सी जरूरतें पूरी नहीं हो रहीं? लगभग सभी जरूरतें पूरी हो रही हैं। जब जीवन का प्रश्न आ गया है तो विलासिता अपने आप खत्म हो गई है। अन्धाधुन्ध दौड़ने वाली कारें सप्ताहों से घर में बन्द हैं। क्या नुकसान हुआ? कुछ नहीं न! बल्कि पर्यावरण कितना सुन्दर हो गया है। कार्बन डाई आॅक्साईड की मात्रा बहुत कम हो गई है। हवा शुद्ध हो गई है। आसमां कितना साफ लगने लगा है। तरह तरह के पंक्षी दिखने लगे हैं। तालाबों, नदियों का पानी कितना साफ हो गया है। सड़क पर कचरा कितना कम हो गया है।
क्या ऐसा नहीं माना जा सकता कि कोरोना वायरस के रूप में प्रकृति ने अपने संतुलन को फिर स्थापित कर लिया है। मानव को घरों में बन्द करके। पूरी दुनिया के मात्र कुछ सप्ताहों तक घरों में रहने से या फिर कहें कि अनावश्यक कामों को न करने से ही प्रकृति पूरी तरह साफ हो गई है। कितने मृतप्राय जीव जन्तु को वही पृथ्वी मिल गई है, जो हम मानवों ने उनसे छिन ली थी।
सोचिए, हम हर दिन प्रकृति का कितना हिस्सा खा रहे थे। सिर्फ अपनी अय्याशी के लिए।
तो...हमें यह तीन सबक याद रखने होंगे।
परन्तु जब कोरोना की दवा निकल जाएगी। मानव उसपर विजय पा लेगा। तब क्या होगा?
मानव इन सबकों को कितने दिन याद रखेगा?
यदि नहीं तो क्या फिर कोई वायरस आएगा जो उसे ऐसे सबक फिर याद कराएगा?
उत्तर आपके ही पास है।

- सुरेश बरनवाल
8-4-2020

Sunday, March 22, 2020

कोरोनाः बाजार और एक सबक

कोरोना को सामान्य भाषा में डाक्टर एक फ्लू कह रहे हैं, जिसका इलाज नहीं ढूंढा जा सका है। साधारण जुकाम, बुखार भी फ्लू होता है परन्तु उसका इलाज निकल चुका है। इसलिए कोरोना भी सामान्य रोग हो जाता यदि हमारे पास उसका इलाज होता। तब कोरोना से कोई नहीं डरता, यहां तक कि उसकी चर्चा तक न होती।
इससे एक बात सामने निकल कर आती है। मानव के लिए रोग खतरनाक नहीं होते, बल्कि उनका इलाज नहीं होना खतरनाक होता है। प्लेग, हैजा, टीबी, टाईफाइड, मलेरिया, चेचक यह सब एक समय बहुत खतरनाक महामारी रह चुकी हैं, क्योंकि उस समय इनका इलाज नहीं था। परन्तु अब इनकी चर्चा तक नहीं होती क्योंकि आज के समय में इनका इलाज है। एक सामान्य आर.एम.पी. भी इनका इलाज कर सकता है।
यदि कोरोना का इलाज हमारे वैज्ञानिक निकाल लेते हैं तो इसका भी इलाज हो जाएगा और हम इससे डरना बन्द कर देंगे।
परन्तु यह कब तक होगा कि हमारे सामने नए रोग आते जाएंगे और हम उनका इलाज ढूंढते रहेंगे। बाॅयोलोजिकल परिवर्तन के इस युग में रोगों की तादाद बढ़ती जा रही है। एड्स, कैंसर, कोविड19 इत्यादि बीमारियां नये समय की देन हैं जबकि हमारे शरीर और वातावरण में कितने नकारात्मक परिवर्तन हो रहे हैं। इन रोगों के अलावा ब्रेन हेमरेज, लकवा, हार्ट अटैक इत्यादि ऐसे कारण भी पनप रहे हैं जो अपने आप में रोग नहीं हैं, उनका परिणाम  हैं, परन्तु जानलेवा साबित हो रहे हैं। यदि आंकड़े एकत्र करें तो हार्ट अटैक से मरने वालों की संख्या रोजाना इतनी है जितनी अब तक इन दिनों में कोरोना के कारण जानें गई हैं। ब्रेन हेमरेज, लकवा यह सभी कितनों की ही जानें ले रहे हैं, परन्तु चूंकि इनके इलाज हमारे पास हैं इसलिए हम इन्हें सामान्य मान लेते हैं, इनकी चर्चा नहीं करते।
कोविड 19 नया वायरस है। यह वायरस मानवीय गलती या फिर वातावरण में बायलोजिकल परिवर्तन के कारण उत्पन्न हुआ है। ऐसे और भी वायरस उत्पन्न हो सकते हैं क्योंकि हम लगातार अपने शरीर, अपनी खान-पान की चीजों से, अपने पर्यावरण से छेड़छाड़ करते आ रहे हैं। साधारण सा कोविड 19 इलाज न मिलने के कारण महामारी बन चुका है, ऐसे अन्य वायरस या रोग भी महामारी बन सकते हैं। क्या हर बार हजारों जानें गंवाकर हम इलाज ही ढूंढते रहेंगे?
दुनिया का बच्चा बच्चा पर्यावरण में हमारी छेड़छाड़ को जानता है। पुस्तकों, मीडिया के तमाम साधनों और बड़ों की बातों ने उसे बता दिया है कि हमने पर्यावरण को खत्म करना शुरू कर दिया है। हम बड़े तो जानते ही हैं। फिर क्या कारण है कि पर्यावरण सुधार के लिए कुछ नहीं हो रहा?
इसका एक बहुत बड़ा कारण बाजार है। गौर कीजिए। ऐसी चीजें जिनसे इन्सान का शरीर रोगों से घिरे, जिनसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, उनसे बाजार अटा पड़ा है। बाजार में जितनी चीजें बिक रही हैं, उनमें आधी चीजें ऐसी होंगी जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हमारे शरीर, हमारे पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं। बाजार इन्हीं चीजों से चल रहा है। कम्पनियां इनसे ही मुनाफा कमा रही हैं। सरकारें इनसे प्राप्त टैक्स से चल रही हैं। यह बन्द हों तो शरीर बीमार होने से बचे, हमारा पर्यावरण बिगड़ने से बचे परन्तु यह बन्द हो जाएंगी तो बाजार हिल जाएगा, सरकारें कम कमाई से परेशान हो जाएंगी। फिर बाजार सत्ता को अप्रत्यक्ष रूप से चलाता है, यह रूके तो रूके कैसे?
हालांकि मुझे समझ नहीं आता कि इसके दूसरे पहलू को सरकारें कैसे नजरअंदाज कर रही हैं। सरकार का कितना ही फण्ड अस्पतालों पर खर्च हो रहा है। यहां तक कि एक आम आदमी भी अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा बीमारियों के इलाज पर खर्च कर रहा है। यदि लोग बीमार कम होंगे तो सरकार का भी खर्च बचेगा और आम जनता का भी। परन्तु यह सब जानते हुए भी यह नहीं हो पा रहा। क्यों?
इसका उत्तर बाजार ही है। बाजार दरअसल लोगों की मुसीबतों और जरूरतों पर चलता है। यदि गर्मी होगी तो आम आदमी ठंडक चाहेगा, उसके लिए बाजार में एसी हैं। एसी से पर्यावरण का बहुत नाश होता है। होता है तो हो! बाजार तो चल निकला न! आम आदमी को ठंडक तो मिली न!
एसी से लोगों का शरीर प्रतिरोधक क्षमता खोता है। इससे वह जल्दी बीमार होता है। बीमार होगा तो उसे अस्पताल चाहेंगे। दवाएं चाहेंगीं। किसे फायदा हुआ? बाजार को न!
तो बाजार यही चाहता है कि लोगों की जरूरत बढ़े। उनमें रोग बढ़े। सरकार भी अप्रत्यक्ष रूप से बाजार को सपोर्ट करती है क्योंकि जब दवाएं बिकेंगी तो उसे टैक्स मिलेगा। उसकी आय बढ़ेगी। मैं यहां सत्ताधीशों और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार की बात करके विषय को लम्बा नहीं करना चाहता जिसके कारण भी बाजार को अंधा सपोर्ट दिया जाता है।
बाजार का एक और पहलू है। वह कमाई बढ़ाने के लिए जरूरत का भ्रम पैदा करता है। वह लालच बढ़ाता है। सही मायनों में तो बाजार का आधा हिस्सा जरूरत के भ्रम और लालच पर चल रहा है। आप गौर कीजिएगा कि आपके घर पर जितनी चीजें हैं, उनमें से कितनी आपकी जरूरत की हैं और कितनी आपके लैविश स्टाईल की। एक साधारण टीवी भी आपको चैनल दिखा सकता है परन्तु हम सत्तर हजार का एलईडी खरीदते हैं ताकि लोगों को दिखाया भी जा सके कि हमारे पास पैसा है। ऐसी चीजों के अतिरिक्त निर्माण में पर्यावरण को ही खोखला किया जाता है।
बाजार इनसे चल रहा है। बाजार अपने आप में एक एन्टीटी है। उसे भी भूख लगती है। भूख से अधिक उसे लालच बहुत होता है। वह नये से नया आईटम लाता है और उसका हजारों तरीके से विज्ञापन करता है ताकि आप उसमें फंस जाएं।
यह नये रोग, इसी लालच के बाजार का उत्पाद हैं।
आईये दुआ करें कि जल्द से जल्द हम कोरोना से छुटकारा पा लें। परन्तु नये रोग नहीं पनपें, हम नयी महामारियों का शिकार नहीं हों, इसके लिए हमें बाजार को नकारना होगा। पूरी तरह न सही, कुछ कुछ ही सही। परन्तु यही शुरूआत होगी महामारियों से हमारे अन्त की।

-सुरेश बरनवाल। 22/03/2020

Friday, March 20, 2020

बलात्कार आखिर खत्म क्यों नहीं हो रहा?

निर्भया के दोषियों को फांसी दे दी गई। एक लम्बे प्रकरण का अंत हो गया। जरूरी था कि इस प्रकार के वीभत्स अपराध पर सजा का अंकुश लगाया जाए। किसी भी सभ्य समाज में बलात्कार जैसे अपराध का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। परन्तु...।
परन्तु मैं यह देख कर हैरान होता हूं कि कहीं भी यह प्रश्न ही नहीं उठाया जा रहा कि आखिर बलात्कार का इलाज सिर्फ सजा में ही क्यों ढूंढा जा रहा है। और क्या सिर्फ सजा देने से बलात्कार रूक जाएंगे?
नहीं!
अब देखिए। कुछ समय पूर्व तक जब बलात्कार होते थे, दोषियों को सजा का डर इसलिए नहीं होता था क्योंकि ऐसी घटनाओं को या तो दबा दिया जाता था या फिर हमारी कानूनी प्रक्रिया में बलात्कार झेलने वाली महिलाओं पर प्रश्नों के द्वारा अप्रत्यक्ष बलात्कार बारम्बार किया जाता था जिससे वह स्वयं केस को लम्बा नहीं खींच पाती थीं या फिर कानूनी खामियों का फायदा उठाकर बलात्कारियों को वकील बचा लिया करते थे। इसलिए बलात्कार की पहले की घटनाओं में बलात्कार के बाद हत्या को अंजाम अपेक्षाकृत कम दिया जाता था। परन्तु जब से कानून इसपर सख्त हुआ है तबसे बलात्कार तो नहीं रूके, हां, उसके बाद बलत्कृत स्त्री को या तो मार ही दिया जाता है या फिर जला दिया जाता है। यह इसलिए किया जाता है ताकि कोई सबूत न बचे।
यानि कि कानून का डर एक और अपराध को अंजाम दे रहा है।
पर कानून का डर तो बहुत जरूरी है। बलात्कार के अपराध की सख्त से सख्त सजा भी बहुत जरूरी है। यह किया भी जा रहा है तो बलात्कार खत्म क्यों नहीं हो रहे?
मेरा यही प्रश्न है समाज से आखिर इस प्रश्न पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा? किसी बलात्कारी को सजा देने के बाद हमारा समाज यूं खुश हो जाता है मानो अब सब कुछ ठीक हो गया। कुछ लोग तो यूं नारेबाजी पर भी उतर आते हैं मानो अब बलात्कार पूरी तरह ही खत्म हो गए हैं।
अरे कुछ बलात्कारी अवश्य खत्म हो गए हैं, परन्तु बलात्कार खत्म नहीं हुए। अभी भी हमारे समाज में बहुत से लोग ऐसे हैं जो बलात्कार की मानसिकता के साथ अपना शिकार ढूंढ रहे हैं और साथ ही वह अवसर भी तलाश कर रहे हैं जबकि वह बलात्कार के बाद सारे सबूत भी मिटा सकते हैं भले ही इसके लिए उस स्त्री को मारना भी क्यों न पड़े।
मेरा कहना यही है कि बलात्कार सिर्फ कानून की सख्ताई से नहीं खत्म होंगे। कानून सख्त होना ही चाहिए, फांसी भी होनी चाहिए, उम्रकैद भी होनी चाहिए, परन्तु मात्र इतना ही पर्याप्त नहीं। और भी बहुत कुछ किया जाना चाहिए जिससे समाज से यह कोढ़ खत्म हो।
परन्तु अफसोस ऐसे प्रश्न उठाते ही लोग भड़क जाते हैं और अपने ही तर्क तलाश कर लेते हैं कि यह प्रश्न उठाने वाला विषयान्तर कर रहा है।
दरअसल बलात्कार सिर्फ कानून की दृष्टि से अपराध नहीं है। यह मानवीय और सामाजिक अपराध भी है। बलात्कार करने वाला सिर्फ अपराधी ही नहीं होता, वह एक विक्षिप्त भी होता है। वह मनोवैज्ञानिक असंतुलन का शिकार भी होता है। वह सैक्स एपीटाईट का मारा भी होता है। वह हार्मोनल डिस्बैलेंस का शिकार भी हो सकता है। मेरे एक परिचित डाॅक्टर के सामने एक ऐसा केस आया है जिसमें एक मात्र नौ वर्ष का बच्चा हस्तमैथून करता था। क्या वह बलात्कार या सैक्स जैसी वृत्ति को पूरी तरह समझता भी है? नहीं। उसके पिता ने स्वयं यह स्वीकारा है कि उसकी लड़कियों में कोई रूचि नहीं। इस प्रवृत्ति के अलावा वह सामान्य बच्चा है। यहां तक कि ऐसा करते समय उसे यह अहसास तक नहीं होता था कि वह कुछ गलत कर रहा है। पूछने पर वह यही कहता था कि उसे अच्छा लगता है। डाॅक्टर ने मुझे बताया था कि यह एक प्रकार की अवस्था है जिसका इलाज किया जाता है। यह सैक्स की वृत्ति नहीं है। यह मात्र इसलिए है कि शरीर के एक अंग को हरकत में लाकर उसे आनन्द मिलता है।
यानि कि यह शरीर में किसी प्रकार की समस्या के कारण है। सैक्स के प्रति अतिरिक्त इच्छा जो कि कभी कभी बलात्कार करने की स्थिति तक ले आती है, शरीर में किसी प्रकार की कमी के कारण भी हो सकती है। ऐसे व्यक्ति को बलात्कार करने की सजा अवश्य दी जाए परन्तु क्या उसके शरीर की उस कमी का इलाज नहीं किया जाना चाहिए?
क्या हमारा कानून ऐसा कोई प्रावधान रखता है? नहीं।
क्या हमारा समाज इस बात को सुनना भी चाहेगा कि यह बलात्कारी है, इसे एक बार डाक्टर को भी दिखा दो।
सब यही चिल्लाएंगे कि इसे सिर्फ सजा दो ताकि बाकी लोग भी डर जाएं।
यह समस्या शारीरिक से भी अधिक मनोवैज्ञाविक समस्या है। एक अवस्था के पश्चात् शरीर में जब परिवर्तन होते हैं तो सैक्स की भावना स्वाभाविक रूप से हर पुरूष और स्त्री के मन में आती है। यह बहुत स्वाभाविक वृत्ति है। परन्तु अवस्था के उस दौर में सही शिक्षा नहीं मिल पाती और समाज में व्याप्त भ्रांतियों के चलते एक डर और छिपाव की मानसिकता पैदा कर दी जाती है। जिससे स्वाभाविक इच्छा और उत्सुकता कुंठा का रूप ले लेती है। सैक्स जैसी भावना एक मायाजाल बन जाती है। एक तो शरीर में होता परिवर्तन और दूसरे उसके प्रति हीन भावना और डर! स्थिति यह हो जाती है कि कम उम्र का किशोर या किशोरी कुंठा में रहते हैं। यह कुंठा भीतर ही भीतर बहुत उलझाव ले लेती है और एक मनोवैज्ञानिक रोग तक बन जाती है। बलात्कार के लिए ऐसी मानसिकता कहीं अधिक जिम्मेवार होती है। इसका इलाज किया जाना चाहिए परन्तु अफसोस कि हमारा समाज इसे मनोवैज्ञानिक समस्या मानना ही नहीं चाहता।
इसलिए यह कहा जा सकता है कि बलात्कारी के अपराध का कारण सिर्फ सैक्स के प्रति उसकी भूख और उसका अपराधी स्वभाव नहीं होता, उसके पीछे अन्य शारीरिक और मनोवैज्ञानिक कारण भी होते हैं। समाज और कानून को यह चाहिए कि वह इसे स्वीकारे सजा के साथ उसके इलाज की भी व्यवस्था करे।
एक अन्य बात भी की जानी चाहिए। हर विद्यालय में हर सप्ताह मनोविज्ञान की कक्षाएं लगानी चाहिएं। किशोरवय के बच्चों को विश्वास के सौहार्दमय वातावरण में उनकी शंकाओं को खुलकर बताने का अवसर दिया जाना चाहिए।
ऐसे और भी बहुत से उपाय होने चाहिएं जिससे इस समस्या को समझा और समय पर इलाज जा सके। इसपर बहुत लम्बी चर्चा हो जाएगी।
पर सबसे पहले तो हमारा समाज और कानून इस समस्या को सही प्रकार समझने के लिए तैयार तो हो।

-सुरेश बरनवाल/21.3.2020

Thursday, September 13, 2018

हिन्दी पर खतरा...पर कितना?


भाषा स्वयं में एक यात्रा है। मानव ने जब से बोलना सीखा तभी से यह यात्रा प्रारम्भ है। मानव की जीभ ने जब किसी विशेष ध्वनि को बार-बार दोहराया होगा तभी भाषा के बीज पड़ गए होंगे। जब इन ध्वनियों की संख्या बढ़ने लगी और यह एक मुख से दूसरे मुख में जाने लगे तो भाषा ने अपना विस्तार शुरू कर दिया। कितने हैरानी की बात है न कि पृथ्वी पर सबसे महान आविष्कार उस मानव ने किए जो आदिम या जंगली कहलाता था। आग, खेती, पहिया और भाषा इस श्रेणी के आविष्कारों में आते हैं। और भी चीजें इस श्रेणी में आ सकती हैं परन्तु इन्हीं चीजों ने इन्सान को इस स्थिति तक पहुंचाया है कि मैं यहां बैठा लिख रहा हूं और आप सैकड़ों मील दूरी पर बैठे मुझे पढ़ रहे हैं।
यह भाषा के विस्तार का चरम है। परन्तु क्या वास्तव में? भाषा क्या इससे अधिक विकसित नहीं होगी? होगी...हो रही है। भाषाएं परस्पर मिल रही हैं। यात्रा के विभिन्न चरण एक ही आंगन में एक दूसरे से मिल रहे हैं। ऐसे में कोई भाषा अपने मूल रूप में नही रह सकती। हर जीव यात्रा करता है अपनी भाषा के साथ। यात्रा में यह दूसरों से मिलता है और भाषा एक-दूसरे में मिलती है।
ऐसे में हिन्दी भाषा के प्रति हम खतरा महसूस क्यों कर रहे हैं? क्या हिन्दी भाषा वास्तव में खतरे में है? क्या इसे अंगे्रजी से खतरा है?
अंग्रेजी से सभी भाषाए दब जाती हैं। वह इसलिए नहीं कि इस भाषा की नुमाईन्दगी करने वालों ने कोई षड्यंत्र रच दिया था। अंग्रेजी ग्रेट ब्रिटेन की भाषा थी। ग्रेट ब्रिटेन पूरी पृथ्वी पर फैला था। दुनिया पर राज करने का दंभ लिए अंग्रेजों ने खुद को सबसे अभिजात्य वर्ग के रूप में स्थापित कर दिया था और अंग्रेजी इनकी ही भाषा थी। इसलिए अंग्रेजी को सबसे अभिजात्य भाषा होने का तमगा स्वतः मिल गया। फिर यह बिना विशेष व्याकरण की भाषा थी। इसमें सबसे अधिक प्रयोग हो सकते थे। इसलिए इसने न सिर्फ हिन्दी को बल्कि पूरे विश्व की तमाम भाषाओं को दोयम कर दिया।  इसे अधिक सम्मान दिया जाने लगा। इतना सम्मान कि खुद की भाषा के प्रति सम्मान कम होने का खतरा उत्पन्न हो गया।
समस्या यही थी। समस्या यही है।
आज हिन्दी दिवस मनाने की आवश्यकता भी इसलिए पड़ी कि हिन्दी के प्रति लोगों के मन में सम्मान का भाव लाया जा सके। समस्या यह नहीं कि अंग्रेजी हमपर हावी है, यह दरअसल पूरे विश्व में हावी है, समस्या यह है कि अपनी मातृभाषा को भी वह सम्मान नहीं दिया जा रहा, जिसकी वह हकदार है।
जब हम हिन्दी में सोचते हैं, बात करते हैं, सपने देखते हैं तो हम हिन्दी पर गर्व क्यों नहीं करते? यह गर्व किसी से उच्च होने का नहीं होना चाहिए, यह इस बात का होना चाहिए कि हम उस भाषा के भाषी हैं, जो साहित्य के हर भाव को पूरी गहराई से व्यक्त करने में सक्षम है। मानव मन के हर भाव को शब्दों में ढाल लेने में सक्षम है।
हिन्दी को एक अन्य वर्ग से खतरा है। वह वर्ग है हिन्दी बोलने वालों का। जी हां, हिन्दी बोलने वाले हिन्दी के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। वह इसलिए कि आज जब फेसबुक, व्हाॅट्सएप और सोशल मीडिया के अन्य साधनों ने सभी को बोलने, लिखने का अवसर दे दिया है तो हर वह व्यक्ति, जो हिन्दी को सही तरीके से लिख नहीं सकता, हिन्दी में अपने उद्गार व्यक्त कर रहा है। उसकी मात्राएं सही नहीं हैं। उसका व्याकरण सही नहीं है। हो सकता है कि कुछ लोग इसे हिन्दी के प्रजातंत्र का युग कहें परन्तु हिन्दी का मूल रूप एक अनुशासनबद्ध तरीके से विकसित हुआ है। मूलतः संस्कृत और उसके अपभं्रश से निकली यह भाषा समृद्ध व्याकरण से बनी हुई है। हिन्दी अपने व्याकरण से मुक्त की जा रही है। एक हद तक तो यह ठीक है परन्तु व्याकरण से पूरी तरह मुक्त कर देना इस भाषा को खतरे में डाल रहा है।
इसलिए बेशक हिन्दी को भाषाओं के यात्रा के इस तेज दौर में स्वतंत्र करने की बात उठे, उसके व्याकरण और शब्द संपदा को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है।
हमारी हिन्दी दिवस की सार्थकता इस परिप्रेक्ष्य में देखी जानी चाहिए।

-सुरेश बरनवाल/14 सितम्बर 2018

Thursday, November 22, 2012

अजमल कसाब को फांसी!


देश की औद्योगिक राजधानी मुम्बई में सरे-आम लोगों को मारने वाले, देश के अस्मिता की हत्या की साजिश में अपराधी साबित हो चुके कसाब को परसों जब फांसी दी गई तो देश के लोगों ने खुशियां जाहिर कीं। मुझे लगता है कि यह दरअसल खुशियां कम संतोष का प्रदर्शन अधिक था। कसाब तो फांसी से पहले ही मर चुका था। उसके होने को पाकिस्तान नकार चुका था। उसके परिवार वालों ने भी उससे रिश्ता तोड़ ही लिया था। जिन लोगों को कसाब ने अपने साथियों के साथ मिलकर मारा, उनके परिजन कसाब की लाश को कल्पना में कितनी ही बार उकेर चुके होंगे। फांसी तो समापन था उन औपचारिकताओं का, जिनपर हमारे देश के करोड़ों रूपये खर्च हो रहे थे। एक पंेडिंग काम खतम होने की खानापूर्ति ही थी कसाब को फांसी पर लटका दिया जाना।
परन्तु कसाब को फांसी पर लटका देने से हमारे देश की ईज्जत तो नहीं ही बढ़ी। जिस कसाब ने खुले आम निर्दोष लोगों को जेहाद के नाम पर मारा, उसे हमने न्यायिक प्रक्रिया के उपरान्त भी डरते हुए, चोरी छिपे फांसी दी। उसने कु्ररता को खुले आम अंजाम दिया और हमने मानवता के हक में न्यायिक प्रक्रिया को भी डर कर पूरा किया। आखिर क्यों? किसका डर था हमें? क्या हमने विश्व के सामने भारत के नेताओं के मन में छिपे डर को ही उजागर नहीं किया? फिर कसाब की कब्र बनाना? हद है हमारे देश के नेताओं के मूर्खता की।
 22/11/2012

Saturday, February 25, 2012

सोमालिया में बसते एलियन


हमारे वैज्ञानिकों को पृत्वी के पास ही एक ऐसा ग्रह मिल गया है, जिसपर पानी मिला है। हमारे वैज्ञानिक उत्साहित हैं क्योंकि वहंा पर वह जीवन की संभावनाएं तलाश सकते हैं। वह देखना चाहते हैं कि परग्रही आखिर किस प्रकार के दिखते होंगे। यदि वास्तव में वहां पर परग्रही मिलते हैं तो हम भी उन्हें देखना चाहेंगे।
परन्तु जब भी ऐसी कोई खबर आती है तो मुझे पृथ्वी पर ही रहने वाले ऐसे मानवों के बारे में ख्याल आ जाता है जो यदि हमारे सामने अचानक आ जाऐं तो हम चौंक जाएं। शायद हम उन्हें एलियन ही मान लें। सोमालिया में शायद ऐसे लोग हैं। भूख ने उनकी हड्डी पर से मांस की आखिरी परत भी सोख ली है। इन्टरनेट पर ऐसी कितनी तस्वीरें मिल जाएंगी, जिन्हें देख कर कलेजा चाक-चाक हो जाता है। कल्पना करता हूं उन मांओं की आंखों और आत्मा में छिपे दर्द की जो कि अपने उस बच्चे को तिल-तिल मरते देखती होगी, जो पैदा होने के बाद शायद ही कभी हंसा हो। मैं नहीं कहता कि हमारे वैज्ञानिक कुछ गलत काम कर रहे हैं, परन्तु एलियन को देखने की भूख लिए इन वैज्ञानिकों और विश्व के सत्ताधीशों को यदि इन भूखे कंकालों के सामने खड़ा कर दिया जाए तो...?
वैज्ञानिकों को बधाई परन्तु हमारे पृथ्वी पर रहने वाले ऐसे लोगों को कैसे सांत्वना दूं जो पृथ्वी पर बिछे पत्थरों की दरारों में रोटी की आस लिए जमींदोज होते जा रहे हैं।