Sunday, March 22, 2020

कोरोनाः बाजार और एक सबक

कोरोना को सामान्य भाषा में डाक्टर एक फ्लू कह रहे हैं, जिसका इलाज नहीं ढूंढा जा सका है। साधारण जुकाम, बुखार भी फ्लू होता है परन्तु उसका इलाज निकल चुका है। इसलिए कोरोना भी सामान्य रोग हो जाता यदि हमारे पास उसका इलाज होता। तब कोरोना से कोई नहीं डरता, यहां तक कि उसकी चर्चा तक न होती।
इससे एक बात सामने निकल कर आती है। मानव के लिए रोग खतरनाक नहीं होते, बल्कि उनका इलाज नहीं होना खतरनाक होता है। प्लेग, हैजा, टीबी, टाईफाइड, मलेरिया, चेचक यह सब एक समय बहुत खतरनाक महामारी रह चुकी हैं, क्योंकि उस समय इनका इलाज नहीं था। परन्तु अब इनकी चर्चा तक नहीं होती क्योंकि आज के समय में इनका इलाज है। एक सामान्य आर.एम.पी. भी इनका इलाज कर सकता है।
यदि कोरोना का इलाज हमारे वैज्ञानिक निकाल लेते हैं तो इसका भी इलाज हो जाएगा और हम इससे डरना बन्द कर देंगे।
परन्तु यह कब तक होगा कि हमारे सामने नए रोग आते जाएंगे और हम उनका इलाज ढूंढते रहेंगे। बाॅयोलोजिकल परिवर्तन के इस युग में रोगों की तादाद बढ़ती जा रही है। एड्स, कैंसर, कोविड19 इत्यादि बीमारियां नये समय की देन हैं जबकि हमारे शरीर और वातावरण में कितने नकारात्मक परिवर्तन हो रहे हैं। इन रोगों के अलावा ब्रेन हेमरेज, लकवा, हार्ट अटैक इत्यादि ऐसे कारण भी पनप रहे हैं जो अपने आप में रोग नहीं हैं, उनका परिणाम  हैं, परन्तु जानलेवा साबित हो रहे हैं। यदि आंकड़े एकत्र करें तो हार्ट अटैक से मरने वालों की संख्या रोजाना इतनी है जितनी अब तक इन दिनों में कोरोना के कारण जानें गई हैं। ब्रेन हेमरेज, लकवा यह सभी कितनों की ही जानें ले रहे हैं, परन्तु चूंकि इनके इलाज हमारे पास हैं इसलिए हम इन्हें सामान्य मान लेते हैं, इनकी चर्चा नहीं करते।
कोविड 19 नया वायरस है। यह वायरस मानवीय गलती या फिर वातावरण में बायलोजिकल परिवर्तन के कारण उत्पन्न हुआ है। ऐसे और भी वायरस उत्पन्न हो सकते हैं क्योंकि हम लगातार अपने शरीर, अपनी खान-पान की चीजों से, अपने पर्यावरण से छेड़छाड़ करते आ रहे हैं। साधारण सा कोविड 19 इलाज न मिलने के कारण महामारी बन चुका है, ऐसे अन्य वायरस या रोग भी महामारी बन सकते हैं। क्या हर बार हजारों जानें गंवाकर हम इलाज ही ढूंढते रहेंगे?
दुनिया का बच्चा बच्चा पर्यावरण में हमारी छेड़छाड़ को जानता है। पुस्तकों, मीडिया के तमाम साधनों और बड़ों की बातों ने उसे बता दिया है कि हमने पर्यावरण को खत्म करना शुरू कर दिया है। हम बड़े तो जानते ही हैं। फिर क्या कारण है कि पर्यावरण सुधार के लिए कुछ नहीं हो रहा?
इसका एक बहुत बड़ा कारण बाजार है। गौर कीजिए। ऐसी चीजें जिनसे इन्सान का शरीर रोगों से घिरे, जिनसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, उनसे बाजार अटा पड़ा है। बाजार में जितनी चीजें बिक रही हैं, उनमें आधी चीजें ऐसी होंगी जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हमारे शरीर, हमारे पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं। बाजार इन्हीं चीजों से चल रहा है। कम्पनियां इनसे ही मुनाफा कमा रही हैं। सरकारें इनसे प्राप्त टैक्स से चल रही हैं। यह बन्द हों तो शरीर बीमार होने से बचे, हमारा पर्यावरण बिगड़ने से बचे परन्तु यह बन्द हो जाएंगी तो बाजार हिल जाएगा, सरकारें कम कमाई से परेशान हो जाएंगी। फिर बाजार सत्ता को अप्रत्यक्ष रूप से चलाता है, यह रूके तो रूके कैसे?
हालांकि मुझे समझ नहीं आता कि इसके दूसरे पहलू को सरकारें कैसे नजरअंदाज कर रही हैं। सरकार का कितना ही फण्ड अस्पतालों पर खर्च हो रहा है। यहां तक कि एक आम आदमी भी अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा बीमारियों के इलाज पर खर्च कर रहा है। यदि लोग बीमार कम होंगे तो सरकार का भी खर्च बचेगा और आम जनता का भी। परन्तु यह सब जानते हुए भी यह नहीं हो पा रहा। क्यों?
इसका उत्तर बाजार ही है। बाजार दरअसल लोगों की मुसीबतों और जरूरतों पर चलता है। यदि गर्मी होगी तो आम आदमी ठंडक चाहेगा, उसके लिए बाजार में एसी हैं। एसी से पर्यावरण का बहुत नाश होता है। होता है तो हो! बाजार तो चल निकला न! आम आदमी को ठंडक तो मिली न!
एसी से लोगों का शरीर प्रतिरोधक क्षमता खोता है। इससे वह जल्दी बीमार होता है। बीमार होगा तो उसे अस्पताल चाहेंगे। दवाएं चाहेंगीं। किसे फायदा हुआ? बाजार को न!
तो बाजार यही चाहता है कि लोगों की जरूरत बढ़े। उनमें रोग बढ़े। सरकार भी अप्रत्यक्ष रूप से बाजार को सपोर्ट करती है क्योंकि जब दवाएं बिकेंगी तो उसे टैक्स मिलेगा। उसकी आय बढ़ेगी। मैं यहां सत्ताधीशों और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार की बात करके विषय को लम्बा नहीं करना चाहता जिसके कारण भी बाजार को अंधा सपोर्ट दिया जाता है।
बाजार का एक और पहलू है। वह कमाई बढ़ाने के लिए जरूरत का भ्रम पैदा करता है। वह लालच बढ़ाता है। सही मायनों में तो बाजार का आधा हिस्सा जरूरत के भ्रम और लालच पर चल रहा है। आप गौर कीजिएगा कि आपके घर पर जितनी चीजें हैं, उनमें से कितनी आपकी जरूरत की हैं और कितनी आपके लैविश स्टाईल की। एक साधारण टीवी भी आपको चैनल दिखा सकता है परन्तु हम सत्तर हजार का एलईडी खरीदते हैं ताकि लोगों को दिखाया भी जा सके कि हमारे पास पैसा है। ऐसी चीजों के अतिरिक्त निर्माण में पर्यावरण को ही खोखला किया जाता है।
बाजार इनसे चल रहा है। बाजार अपने आप में एक एन्टीटी है। उसे भी भूख लगती है। भूख से अधिक उसे लालच बहुत होता है। वह नये से नया आईटम लाता है और उसका हजारों तरीके से विज्ञापन करता है ताकि आप उसमें फंस जाएं।
यह नये रोग, इसी लालच के बाजार का उत्पाद हैं।
आईये दुआ करें कि जल्द से जल्द हम कोरोना से छुटकारा पा लें। परन्तु नये रोग नहीं पनपें, हम नयी महामारियों का शिकार नहीं हों, इसके लिए हमें बाजार को नकारना होगा। पूरी तरह न सही, कुछ कुछ ही सही। परन्तु यही शुरूआत होगी महामारियों से हमारे अन्त की।

-सुरेश बरनवाल। 22/03/2020

No comments:

Post a Comment