Thursday, April 9, 2020

कोरोना वायरस के बहानेः तीन सबक।

कोरोना वायरस महामारी एक अभूतपूर्व त्रासद घटना है, जो इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जारी है। जारी क्या है, कहना चाहिए अपने उफान पर है। एक छोटे से वायरस ने मानव को उसकी औकात बता दी है। उस मानव को जो अपने को सर्वशक्तिमान मानता आया है। जो असंख्यों जीवों के लिए बनी इस पृथ्वी को मात्र अपने लिए मान बैठा है। जिसकी अप्राकृतिक दिनचर्या और सुविधाभोगिता ने असंख्यों जीवों का जीवन खतम कर दिया है। पृथ्वी को सहेजने वाली नदियां सोख ली हैं, प्राणदायिनी हवा में जहर घोल दिया है, सुरक्षा प्रदान करने वाले ओजोन लेयर को खत्म कर दिया है। कहा जा सकता है कि अपनी सुविधाभोगिता के लिए मानव ने प्रकृति को मानवों के लायक भी नहीं छोड़ा जिसका परिणाम है प्रकृति का यह कहर। वैसे तो अनगिनत कहर मानव पर बरसे हैं, परन्तु वह किसी क्षेत्र विशेष के होने के कारण या उनका प्रत्यक्ष परिणाम बहुत कम लगने के कारण मानव ने उन्हें गंभीरता से लिया ही नहीं। अब यह कहर बरपा है जो पूरे विश्व पर है। गरीब से लेकर सबसे अमीर लोगों पर यह कहर बरपा है। स्वयं को सुरक्षित महलों में रखने वाले भी इसकी चपेट में आए हैं। कल्पना करें, यदि यह कहर मात्र गरीबों पर बरपा होता तो क्या होता? निश्चित ही दुनिया के बड़े लोगों के लिए यह कोई समस्या नहीं होती। व्यापारी लोग उसमें अपना बाजार खोजने लग जाते। नेताओं के लिए वह राजनीति का एजेंडा होता, जिसके वह चिन्तित दिखते पर वास्तव में होते नहीं। पर चूंकि यह वायरस किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करता, इसलिए विश्व के सबसे ताकतवर भी परेशान हैं। प्रकृति, सत्ता और ताकत को वह अपने पक्ष में हमेशा झुकाते आए हैं, इस वायरस ने उनमें खलबली मचा दी है।
यह दौर कब तक चलेगा, निश्चित नहीं कहा जा सकता। परन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि मानव अपनी स्वार्थपरता के बावजूद सबसे अधिक जीजिविषा वाला जीव है। पिछले तमाम महामारियों से वह बहुत नुकसान के बाद ही सही, पर जीता है। इससे भी जीतेगा। जीतना भी चाहिए परन्तु...।
आप आज की स्थिति देखें या उस स्थिति की कल्पना अभी कर लें जब कोरोना कोविड 19 की दवा ईजाद कर ली जाएगी, जैसी कि पूर्व की महामारियों यथा चेचक, मलेरिया, हैजा, प्लेग इत्यादि की खोज ली गई है। तीन चीजें उभर कर सामने आती हैं। इसे आप सबक मान लें या फिर चोट। परन्तु यह तीन चीजें पहले से हमारे सामने आनी चाहिए थीं। यदि आई भी हैं तो हमने कभी उसे महत्व नहीं दिया।
यह तीन चीजें क्या हैं?
पहली, मानव के लिए सबसे जरूरी है चिकित्सा सुविधाएं। यह मानव के लिए विज्ञान का सबसे बड़ा विषय होना चाहिए।
हमें बिना किसी भेदभाव के चिकित्सा सुविधाएं हर व्यक्ति तक पहुंचानी चाहिएं। स्थिति वास्तव में यह है कि अमीरों के लिए हर प्रकार की चिकित्सा सुविधा है जबकि गरीबों के लिए किसी भी गंभीर बीमारी का ईलाज मात्र मौत है। विभिन्न देशों में हर नागरिकों को चिकित्सा सुविधा समान रूप से उपलब्ध है, परन्तु ऐसे देश बहुत कम हैं। भारत जैसे देश में तो तमाम दुहाईयों के बाद भी गरीब अनसुना रह जाता है और उसकी मौत पर देश के सिस्टम का एक हिस्सा भी खुद को जिम्मेवार नहीं मानता। कोरोना वायरस ने बिना भेदभाव के अमीर गरीब सभी को अपना शिकार बनाया है। इसे एक संदेश के रूप में लेना चाहिए कि भेदभाव मानव भी खत्म कर दे।
इसके साथ ही चिकित्सा क्षेत्र में नये नये अनुसंधान होते रहने चाहिएं। चिकित्सा क्षेत्र को बाजार से संचालित किए जाने के बजाय सेवा से संचालित करना जरूरी है वरना यह भेदभाव एक दिन दुनिया में नये नये रोग बनाएगा न कि दवा। आज पूरी दुनिया में मास्क, वेंटिलेटर और दवाओं की कमी सामने आ रही है। यह वक्ती तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए। हमारी सुविधाभोगी दिनचर्या ने बहुत से नये रोग सामने लाए हैं। कैंसर, एड्स, हाई बीपी, शुगर यह सब रोजाना हजारों जीवन लील लेती हैं, परन्तु इनकी चर्चा नहीं होती। क्या हम दावा कर सकते हैं कि आगे ऐसे वायरस या विषाणु और नहीं आएंगे? हमें इन सबके लिए तैयार रहना होगा। हर रोग की दवा और जरूरी उपकरण उपलब्ध करवाने होंगे और वो भी हर किसी के लिए। यह बहुत बड़ा सबक है कोरोना का। मानव इसे स्वीकार करे वरना तो राम मालिक है।
जी हां, राम मालिक है। यह वाक्य शताब्दियों से अलग अलग रूपों में हर धर्म में बोला जाता है। खुदा मेहरबान है। क्राइस्ट सबकी रक्षा करता है। सरीखे कितने ही वाक्य हमारी सोच, हमारी संस्कृति में व्याप्त हो चुके हैं। पूरी दुनिया में धर्म ऐसा विषय है जिसपर प्रश्न उठाना अपराध माना जाता है। परमात्मा को सबसे शक्तिशाली माना गया है और कहा गया है कि वह कुछ भी कर सकता है।
मैं इन सबकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता। मैं ईश्वर के बारे में बहुत कम जानता हूं, इसलिए उसे स्वीकार करने या अस्वीकार करने का ठोस दावा मैं नहीं करता। परन्तु आज के समय में संकटमोचक कौन बनकर सामने आ रहा है। विज्ञान या धर्म? मैं अध्यात्म शब्द उपयोग में नहीं ले रहा क्योंकि अध्यात्म के बहुत गहरे मायने हैं। धर्म इसी अध्यात्म का विकृत रूप है। वस्तुतः यह शब्द विकृत नहीं था। आमभाषा में सरल व्याख्याओं के रूप में अध्यात्म ही धर्म था। परन्तु धर्म को इतना विकृत किया जा चुका है कि अध्यात्म और धर्म को अब अलग कर ही दिया जाना चाहिए। सभी मंदिर बन्द हैं। मस्जिदें बन्द हैं। जहां बन्द नहीं की गईं वहां कोरोना ने और अधिक कहर बरपा दिया है। चर्च, गुरूद्वारे। सभी बन्द हैं। चिकित्सा से जुड़े लोग हमारी मदद के लिए आगे आए हैं। वह अपने पेशे के चलते ही इस कार्य में नहीं हैं, बल्कि बहुत से ऐेसे लोग जो चिकित्सा सेवा छोड़ चुके थे, सामने आकर सहायता करना चाहते हैं। मरते आदमी के लिए संक्रमण के खतरे के बावजूद डाक्टर, नर्सें काम कर रही हैं। सफाई वाले सड़कों पर आकर दिन रात सफाई कर रहे हैं। सोचिए यदि यह सामने नहीं आते तो मानव कहां जाता? मंदिर, मस्जिद तो सभी बन्द हैं, कहां जाता मानव? धर्म की व्याख्यायें करने वाले सामने ही नहीं आ रहे। अब भी मंदिर मस्जिदों के नियंता किसी प्रकार की सहायता नहीं कर रहे। सदियों से मानव इनपर जी खोलकर पैसे उछालता रहा है। बड़े मंदिरों में तो करोड़ों रूपये के सोने के छत्र दान किए जाते रहे हैं। यह दान आज कहां काम आ रहे हैं? यदि यही दान विज्ञान संस्थाओं को दिए जाते तो? सरकारी अस्पतालों को दिए जाते तो? कितने वेंटिलेटर, कितनी दवाएं, कितने मास्क, कितने अस्पताल आज इन पैसों से बन चुके होते। अनुसंधान करने वाले बगैर किसी चिन्ता के बड़े प्रयोग अपने हाथ में ले लेते। परन्तु हम यह नहीं करते।
हैरानी की बात तो तब है जब ऐसे दान या अन्धविश्वास करने के लिए किसी भी धर्म का ईश्वर नहीं कहता। वह तो उस धर्म के ठेकेदार कहते हैं। लाखों रूपये की बनी सेज पर बैठकर त्याग करने का प्रवचन देने वाले अपने ही तरीके से ईश्वर को परिभाषित करते हैं। सबसे अफसोस की बात तो तब है जब कि जनता आंख मूंदकर इनकी बात पर विश्वास भी कर लेती है। यदि हम यह मान भी लें कि ईश्वर ने मानव को बनाया है तो ईश्वर ने मानव में इतनी बुद्धि, इतना सामथ्र्य इसलिए ही तो दिया है कि वह स्वयं प्रयास करे न कि खुद हाथ पर हाथ धरकर ईश्वर से कहे कि तू ही कर।
तो दूसरा सबक यह है कि विज्ञान को धर्म से अधिक महत्व दीजिए। हो सके तो धर्म को अध्यात्म की तरफ ले जाईये। धर्म के सभी ठेकेदारों को ठोकर मारिये और विज्ञान को शक्तिशाली बनाईये। यदि कमाई के बाद आपके पास पूंजी बच रही है तो उसका कुछ हिस्सा ऐसी संस्थाओं को दीजिए जो मानवता की सेवा के लिए बनी हैं न कि अपने मालिकों की सेवा के लिए।
तीसरा सबक। और यह सबक तो बहुत पहले से मानव के सामने रखा जा रहा है, परन्तु वह माने तब तो। यह सबक है प्रकृति से खिलवाड़ नहीं करने का सबक। सही उपमा है मानव के लिए कि जिस डाल पर बैठा है, उसी को काट रहा है। प्रकृति से खिलवाड़ का ही परिणाम है कि प्रकृति के कितने ही चक्र बिगड़ चुके हैं। हर जीव हर दूसरे जीव के लिए प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से जरूरी है। एक जीवन चक्र है जो अपने वृहद्तम रूप में दर्शाता है कि पृथ्वी के इस कोने पर रहते मनुष्य के लिए दूसरे कोने पर रेंगने वाली चींटी भी लाभदायक है और उस वृहद् जीवनचक्र में अपनी महती भूमिका निभाती है, जिसे हम मानवों ने जाना है परन्तु हम उसकी परवाह नहीं करते। हमें सौ मीटर दूर जाने के लिए कार चाहिए, हमें एसी चला कर छोड़ देते हैं कि कमरा हर वक्त ठंडा मिले, भले ही हमें उसकी जरूरत पूरे दिन में पांच मिनट हो। हमें महंगे फोन चाहिएं भले ही उसके लिए कितने धातु जमीन के गर्भ से निकालकर जमीन को खोखला किया जाता हो। इस समय विश्व का पूरा बाजार तीस प्रतिशत जरूरत की चीजों से और सत्तर प्रतिशत विलासिता और आरामतलबी की चीजों से अटा पड़ा है।
कोरोना के दौरान लाॅकडाऊन के परिदृश्य को देखिये। अगर दिहाड़ी मजदूरों की बात छोड़ दें तो बाकी आम जन की कौन सी जरूरतें पूरी नहीं हो रहीं? लगभग सभी जरूरतें पूरी हो रही हैं। जब जीवन का प्रश्न आ गया है तो विलासिता अपने आप खत्म हो गई है। अन्धाधुन्ध दौड़ने वाली कारें सप्ताहों से घर में बन्द हैं। क्या नुकसान हुआ? कुछ नहीं न! बल्कि पर्यावरण कितना सुन्दर हो गया है। कार्बन डाई आॅक्साईड की मात्रा बहुत कम हो गई है। हवा शुद्ध हो गई है। आसमां कितना साफ लगने लगा है। तरह तरह के पंक्षी दिखने लगे हैं। तालाबों, नदियों का पानी कितना साफ हो गया है। सड़क पर कचरा कितना कम हो गया है।
क्या ऐसा नहीं माना जा सकता कि कोरोना वायरस के रूप में प्रकृति ने अपने संतुलन को फिर स्थापित कर लिया है। मानव को घरों में बन्द करके। पूरी दुनिया के मात्र कुछ सप्ताहों तक घरों में रहने से या फिर कहें कि अनावश्यक कामों को न करने से ही प्रकृति पूरी तरह साफ हो गई है। कितने मृतप्राय जीव जन्तु को वही पृथ्वी मिल गई है, जो हम मानवों ने उनसे छिन ली थी।
सोचिए, हम हर दिन प्रकृति का कितना हिस्सा खा रहे थे। सिर्फ अपनी अय्याशी के लिए।
तो...हमें यह तीन सबक याद रखने होंगे।
परन्तु जब कोरोना की दवा निकल जाएगी। मानव उसपर विजय पा लेगा। तब क्या होगा?
मानव इन सबकों को कितने दिन याद रखेगा?
यदि नहीं तो क्या फिर कोई वायरस आएगा जो उसे ऐसे सबक फिर याद कराएगा?
उत्तर आपके ही पास है।

- सुरेश बरनवाल
8-4-2020

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