मेरी उस संस्था को एक साल से अधिक हो गया है, जिसे मैंने स्थापित किया था। परन्तु एक साल बाद ही मैं मेरी संस्था से हटा दिया। क्या कारण मेरे साथियों का बना गुट था अथवा मेरा अधिक आदर्शवादी होना? अथवा फिर मेरा हर किसी के लिए पूर्ण रूप से सहज हो जाना। मैं समझ नहीं पाया था कि किसी संस्था में निरपेक्ष लोगों का होना बहुत लाजमी है। मेरे साथ जो दोस्त जुड़े, उनका आपस में एक गुट था। वे सक्रिय थे परन्तु वे चाहते थे कि वे अपने काम को ऐेसे अंजाम दें मानो कुछ दोस्त मिलकर काम कर रहे हों। मैं उनका दोस्त नहीं था। जाहिर है इसलिए मैं उनके बीच तब उपेक्षित हो गया जब उन्होंने सारे कामों को, जिनमें फैसले लेने शामिल थे, सम्हाल लिया। मैं प्रारम्भ से ही अपने दोस्तों के फैसलों को स्वीकार करता रहा था। परिणाम अजीब रहा। वे मेरी उपस्थिति कम से कम चाहने लगे। फिर हमारे मध्य एक ऐसा सदस्य आया, जो जरूरत से अधिक मैच्योर था। ऐसे लोग दूसरों का मजाक उड़ाने लगते हैं। मैंने अपने दोस्तों के रूख को सहज स्वीकार किया और अलग होना चाहा। परन्तु यह भी मेरे साथियों को स्वीकार नहीं था। शायद इसलिए कि फिर विवादास्पद फैसलों में किसका नाम लिया जाएगा। या फिर शायद यह कारण रहा कि वे मेरे प्रभाव से जुड़े मेरे कुछ साथियों के प्रश्नों से बचना चाहते थे।
मैं आज स्वयं को अपनी ही संस्था से पूरी तरह विमुख पाता हूं। मैंने अपनी प्रथम किताब के अन्तिम पृष्ठ पर स्वयं को अपनी संस्था का संस्थापक अध्यक्ष लिखा तो है परन्तु मैं जानता हूं कि मेरे साथियों को शायद यह भी पसन्द नहीं आएगा।
मैंने अपनी जिन्दगी का सबक लिया है कि किसी संस्था को शुरू करते समय किसी एक गुट को उसमें शिरकत मत करने दो। संस्था के लिए यह कदापि उचित नहीं हो सकता।
परन्तु क्या इसमें मेरी कमी नहीं रही होगी? यदि मेरे साथी मेरे से नहीं जुड़ सके तो कुछ तो कमी मेरे में थी ही। हालांकि इस समय मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर क्या कमी रही थी मेरे में-शायद आगे कभी मैं महसूस कर सकूं अपनी कमी को।
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