हस्तक्षेप-हमारे मन के भीतरी परतों में-उन बातों में, जिनके बारे में हम सोचने से डरते हैं। हस्तक्षेप-हमारे विचारों के अनसुलझे पहलूओं की दुनिया में। भले ही हम बेबाक कह न सकें, परन्तु बेबाक होकर हम अपने विचारों पर विचार करें।
लिख सकते हैं तो लिखिये, पर साहस होना चाहिए।
एक प्रश्न देता हूं। हम अपनी सौ गलतियों को भी माफ करते हैं, परन्तु दूसरे की एक गलती को भी माफ क्यों नहीं कर पाते-चाहते हुए भी।
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