Sunday, June 5, 2011

बाबा रामदेव...ऐसा क्यों?

प्रसिद्धि की चाहत शायद मानव मन के सबसे भीतरी परत पर लिपटी सोने के वर्क की तरह है, जो अपनी चमक सबके सामने लाना चाहती है। तभी तो वह मानव शरीर से स्वयं तक की सारी भाव परतों को प्रभावित करती हुई महत्वकांछाओं के रूप में प्रगट होती है। बाबा रामदेव भी इस भीतरी परत के सोने की चमक से चकाचौंध हो गए। उन्होंने मुद्दा तो सही उठाया परन्तु इस कार्य में उनकी व्यक्तिगत महत्वकांछाएं कहीं अधिक भूमिका अदा कर रही थी। सोचिए यदि सरकार उनसे तथा उनके समर्थकों से जोर-जबरदस्ती नहीं करती तो बाबा रामदेव के पास बोलने के लिए क्या रहना था? कुछ नहीं।

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