Tuesday, October 12, 2010

साहित्य की नई विधा

साहित्य की कई विधाओं में एक अन्य विधा को शामिल किया जाना चाहिए। उस विधा का नाम है सम्पर्क। दरअसल मैंने महसूस किया है कि मात्र साहित्य लिखने से आप चर्चित नहीं हो जाते। साहित्यकारों के सम्पर्क में आने से आपका साहित्य चर्चा पाता है। भले ही आप राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हों, परन्तु आम आदमी आपको नहीं जानता। साहित्यकार भी आपके नाम को नोटिस में नहीं लेते। इससे क्या यह तथ्य सामने नहीं आता कि आम आदमी के साथ साहित्यकारों को भी साहित्य से विशेष लेना-देना नहीं होता। हां, यदि साहित्यकार जानकार है, आपके सम्पर्क में है तो उसका साहित्य स्वीकारा जाता है। ऐसे में साहित्य क्या ठगा नहीं जा रहा?

9 comments:

  1. sahi kaha... jisne bhi blogging ki shuruwat ki uske hum sab tahe dil se aabhari hai ki hame apne vichar rakhne ka itna accha jariya mila... :)

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  2. सही बात है, यह सच है भले आपकी रचना कितनी भी अच्छी हो मगर वो लोगो के संपर्क में नहीं आये या वह रचना कोई न जाने तो उसे प्रसिद्धि नहीं मिलती...

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  3. apne sahi likha hai..is baat ke wabat mene kuch likha hai mere blog pe...apne bhi wohi likha hai..kam s ekam logo ko achi rachnaye chahe naye logo ki ho padhani chahiye

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  4. आप ने बिल्कुल सही लिखा है।

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  5. बहुत सही कहा आपने .....

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  6. bitter truth, great u have shown courage, i like such truth

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  7. इकदम सही कहा है आपने.
    जारी रहिये.

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  8. अच्छी पोस्ट ,विजय दशमी की शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

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