बलात्कार आखिर खत्म क्यों नहीं हो रहा?
निर्भया के दोषियों को फांसी दे दी गई। एक लम्बे प्रकरण का अंत हो गया। जरूरी था कि इस प्रकार के वीभत्स अपराध पर सजा का अंकुश लगाया जाए। किसी भी सभ्य समाज में बलात्कार जैसे अपराध का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। परन्तु...।
परन्तु मैं यह देख कर हैरान होता हूं कि कहीं भी यह प्रश्न ही नहीं उठाया जा रहा कि आखिर बलात्कार का इलाज सिर्फ सजा में ही क्यों ढूंढा जा रहा है। और क्या सिर्फ सजा देने से बलात्कार रूक जाएंगे?
नहीं!
अब देखिए। कुछ समय पूर्व तक जब बलात्कार होते थे, दोषियों को सजा का डर इसलिए नहीं होता था क्योंकि ऐसी घटनाओं को या तो दबा दिया जाता था या फिर हमारी कानूनी प्रक्रिया में बलात्कार झेलने वाली महिलाओं पर प्रश्नों के द्वारा अप्रत्यक्ष बलात्कार बारम्बार किया जाता था जिससे वह स्वयं केस को लम्बा नहीं खींच पाती थीं या फिर कानूनी खामियों का फायदा उठाकर बलात्कारियों को वकील बचा लिया करते थे। इसलिए बलात्कार की पहले की घटनाओं में बलात्कार के बाद हत्या को अंजाम अपेक्षाकृत कम दिया जाता था। परन्तु जब से कानून इसपर सख्त हुआ है तबसे बलात्कार तो नहीं रूके, हां, उसके बाद बलत्कृत स्त्री को या तो मार ही दिया जाता है या फिर जला दिया जाता है। यह इसलिए किया जाता है ताकि कोई सबूत न बचे।
यानि कि कानून का डर एक और अपराध को अंजाम दे रहा है।
पर कानून का डर तो बहुत जरूरी है। बलात्कार के अपराध की सख्त से सख्त सजा भी बहुत जरूरी है। यह किया भी जा रहा है तो बलात्कार खत्म क्यों नहीं हो रहे?
मेरा यही प्रश्न है समाज से आखिर इस प्रश्न पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा? किसी बलात्कारी को सजा देने के बाद हमारा समाज यूं खुश हो जाता है मानो अब सब कुछ ठीक हो गया। कुछ लोग तो यूं नारेबाजी पर भी उतर आते हैं मानो अब बलात्कार पूरी तरह ही खत्म हो गए हैं।
अरे कुछ बलात्कारी अवश्य खत्म हो गए हैं, परन्तु बलात्कार खत्म नहीं हुए। अभी भी हमारे समाज में बहुत से लोग ऐसे हैं जो बलात्कार की मानसिकता के साथ अपना शिकार ढूंढ रहे हैं और साथ ही वह अवसर भी तलाश कर रहे हैं जबकि वह बलात्कार के बाद सारे सबूत भी मिटा सकते हैं भले ही इसके लिए उस स्त्री को मारना भी क्यों न पड़े।
मेरा कहना यही है कि बलात्कार सिर्फ कानून की सख्ताई से नहीं खत्म होंगे। कानून सख्त होना ही चाहिए, फांसी भी होनी चाहिए, उम्रकैद भी होनी चाहिए, परन्तु मात्र इतना ही पर्याप्त नहीं। और भी बहुत कुछ किया जाना चाहिए जिससे समाज से यह कोढ़ खत्म हो।
परन्तु अफसोस ऐसे प्रश्न उठाते ही लोग भड़क जाते हैं और अपने ही तर्क तलाश कर लेते हैं कि यह प्रश्न उठाने वाला विषयान्तर कर रहा है।
दरअसल बलात्कार सिर्फ कानून की दृष्टि से अपराध नहीं है। यह मानवीय और सामाजिक अपराध भी है। बलात्कार करने वाला सिर्फ अपराधी ही नहीं होता, वह एक विक्षिप्त भी होता है। वह मनोवैज्ञानिक असंतुलन का शिकार भी होता है। वह सैक्स एपीटाईट का मारा भी होता है। वह हार्मोनल डिस्बैलेंस का शिकार भी हो सकता है। मेरे एक परिचित डाॅक्टर के सामने एक ऐसा केस आया है जिसमें एक मात्र नौ वर्ष का बच्चा हस्तमैथून करता था। क्या वह बलात्कार या सैक्स जैसी वृत्ति को पूरी तरह समझता भी है? नहीं। उसके पिता ने स्वयं यह स्वीकारा है कि उसकी लड़कियों में कोई रूचि नहीं। इस प्रवृत्ति के अलावा वह सामान्य बच्चा है। यहां तक कि ऐसा करते समय उसे यह अहसास तक नहीं होता था कि वह कुछ गलत कर रहा है। पूछने पर वह यही कहता था कि उसे अच्छा लगता है। डाॅक्टर ने मुझे बताया था कि यह एक प्रकार की अवस्था है जिसका इलाज किया जाता है। यह सैक्स की वृत्ति नहीं है। यह मात्र इसलिए है कि शरीर के एक अंग को हरकत में लाकर उसे आनन्द मिलता है।
यानि कि यह शरीर में किसी प्रकार की समस्या के कारण है। सैक्स के प्रति अतिरिक्त इच्छा जो कि कभी कभी बलात्कार करने की स्थिति तक ले आती है, शरीर में किसी प्रकार की कमी के कारण भी हो सकती है। ऐसे व्यक्ति को बलात्कार करने की सजा अवश्य दी जाए परन्तु क्या उसके शरीर की उस कमी का इलाज नहीं किया जाना चाहिए?
क्या हमारा कानून ऐसा कोई प्रावधान रखता है? नहीं।
क्या हमारा समाज इस बात को सुनना भी चाहेगा कि यह बलात्कारी है, इसे एक बार डाक्टर को भी दिखा दो।
सब यही चिल्लाएंगे कि इसे सिर्फ सजा दो ताकि बाकी लोग भी डर जाएं।
यह समस्या शारीरिक से भी अधिक मनोवैज्ञाविक समस्या है। एक अवस्था के पश्चात् शरीर में जब परिवर्तन होते हैं तो सैक्स की भावना स्वाभाविक रूप से हर पुरूष और स्त्री के मन में आती है। यह बहुत स्वाभाविक वृत्ति है। परन्तु अवस्था के उस दौर में सही शिक्षा नहीं मिल पाती और समाज में व्याप्त भ्रांतियों के चलते एक डर और छिपाव की मानसिकता पैदा कर दी जाती है। जिससे स्वाभाविक इच्छा और उत्सुकता कुंठा का रूप ले लेती है। सैक्स जैसी भावना एक मायाजाल बन जाती है। एक तो शरीर में होता परिवर्तन और दूसरे उसके प्रति हीन भावना और डर! स्थिति यह हो जाती है कि कम उम्र का किशोर या किशोरी कुंठा में रहते हैं। यह कुंठा भीतर ही भीतर बहुत उलझाव ले लेती है और एक मनोवैज्ञानिक रोग तक बन जाती है। बलात्कार के लिए ऐसी मानसिकता कहीं अधिक जिम्मेवार होती है। इसका इलाज किया जाना चाहिए परन्तु अफसोस कि हमारा समाज इसे मनोवैज्ञानिक समस्या मानना ही नहीं चाहता।
इसलिए यह कहा जा सकता है कि बलात्कारी के अपराध का कारण सिर्फ सैक्स के प्रति उसकी भूख और उसका अपराधी स्वभाव नहीं होता, उसके पीछे अन्य शारीरिक और मनोवैज्ञानिक कारण भी होते हैं। समाज और कानून को यह चाहिए कि वह इसे स्वीकारे सजा के साथ उसके इलाज की भी व्यवस्था करे।
एक अन्य बात भी की जानी चाहिए। हर विद्यालय में हर सप्ताह मनोविज्ञान की कक्षाएं लगानी चाहिएं। किशोरवय के बच्चों को विश्वास के सौहार्दमय वातावरण में उनकी शंकाओं को खुलकर बताने का अवसर दिया जाना चाहिए।
ऐसे और भी बहुत से उपाय होने चाहिएं जिससे इस समस्या को समझा और समय पर इलाज जा सके। इसपर बहुत लम्बी चर्चा हो जाएगी।
पर सबसे पहले तो हमारा समाज और कानून इस समस्या को सही प्रकार समझने के लिए तैयार तो हो।
-सुरेश बरनवाल/21.3.2020
निर्भया के दोषियों को फांसी दे दी गई। एक लम्बे प्रकरण का अंत हो गया। जरूरी था कि इस प्रकार के वीभत्स अपराध पर सजा का अंकुश लगाया जाए। किसी भी सभ्य समाज में बलात्कार जैसे अपराध का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। परन्तु...।
परन्तु मैं यह देख कर हैरान होता हूं कि कहीं भी यह प्रश्न ही नहीं उठाया जा रहा कि आखिर बलात्कार का इलाज सिर्फ सजा में ही क्यों ढूंढा जा रहा है। और क्या सिर्फ सजा देने से बलात्कार रूक जाएंगे?
नहीं!
अब देखिए। कुछ समय पूर्व तक जब बलात्कार होते थे, दोषियों को सजा का डर इसलिए नहीं होता था क्योंकि ऐसी घटनाओं को या तो दबा दिया जाता था या फिर हमारी कानूनी प्रक्रिया में बलात्कार झेलने वाली महिलाओं पर प्रश्नों के द्वारा अप्रत्यक्ष बलात्कार बारम्बार किया जाता था जिससे वह स्वयं केस को लम्बा नहीं खींच पाती थीं या फिर कानूनी खामियों का फायदा उठाकर बलात्कारियों को वकील बचा लिया करते थे। इसलिए बलात्कार की पहले की घटनाओं में बलात्कार के बाद हत्या को अंजाम अपेक्षाकृत कम दिया जाता था। परन्तु जब से कानून इसपर सख्त हुआ है तबसे बलात्कार तो नहीं रूके, हां, उसके बाद बलत्कृत स्त्री को या तो मार ही दिया जाता है या फिर जला दिया जाता है। यह इसलिए किया जाता है ताकि कोई सबूत न बचे।
यानि कि कानून का डर एक और अपराध को अंजाम दे रहा है।
पर कानून का डर तो बहुत जरूरी है। बलात्कार के अपराध की सख्त से सख्त सजा भी बहुत जरूरी है। यह किया भी जा रहा है तो बलात्कार खत्म क्यों नहीं हो रहे?
मेरा यही प्रश्न है समाज से आखिर इस प्रश्न पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा? किसी बलात्कारी को सजा देने के बाद हमारा समाज यूं खुश हो जाता है मानो अब सब कुछ ठीक हो गया। कुछ लोग तो यूं नारेबाजी पर भी उतर आते हैं मानो अब बलात्कार पूरी तरह ही खत्म हो गए हैं।
अरे कुछ बलात्कारी अवश्य खत्म हो गए हैं, परन्तु बलात्कार खत्म नहीं हुए। अभी भी हमारे समाज में बहुत से लोग ऐसे हैं जो बलात्कार की मानसिकता के साथ अपना शिकार ढूंढ रहे हैं और साथ ही वह अवसर भी तलाश कर रहे हैं जबकि वह बलात्कार के बाद सारे सबूत भी मिटा सकते हैं भले ही इसके लिए उस स्त्री को मारना भी क्यों न पड़े।
मेरा कहना यही है कि बलात्कार सिर्फ कानून की सख्ताई से नहीं खत्म होंगे। कानून सख्त होना ही चाहिए, फांसी भी होनी चाहिए, उम्रकैद भी होनी चाहिए, परन्तु मात्र इतना ही पर्याप्त नहीं। और भी बहुत कुछ किया जाना चाहिए जिससे समाज से यह कोढ़ खत्म हो।
परन्तु अफसोस ऐसे प्रश्न उठाते ही लोग भड़क जाते हैं और अपने ही तर्क तलाश कर लेते हैं कि यह प्रश्न उठाने वाला विषयान्तर कर रहा है।
दरअसल बलात्कार सिर्फ कानून की दृष्टि से अपराध नहीं है। यह मानवीय और सामाजिक अपराध भी है। बलात्कार करने वाला सिर्फ अपराधी ही नहीं होता, वह एक विक्षिप्त भी होता है। वह मनोवैज्ञानिक असंतुलन का शिकार भी होता है। वह सैक्स एपीटाईट का मारा भी होता है। वह हार्मोनल डिस्बैलेंस का शिकार भी हो सकता है। मेरे एक परिचित डाॅक्टर के सामने एक ऐसा केस आया है जिसमें एक मात्र नौ वर्ष का बच्चा हस्तमैथून करता था। क्या वह बलात्कार या सैक्स जैसी वृत्ति को पूरी तरह समझता भी है? नहीं। उसके पिता ने स्वयं यह स्वीकारा है कि उसकी लड़कियों में कोई रूचि नहीं। इस प्रवृत्ति के अलावा वह सामान्य बच्चा है। यहां तक कि ऐसा करते समय उसे यह अहसास तक नहीं होता था कि वह कुछ गलत कर रहा है। पूछने पर वह यही कहता था कि उसे अच्छा लगता है। डाॅक्टर ने मुझे बताया था कि यह एक प्रकार की अवस्था है जिसका इलाज किया जाता है। यह सैक्स की वृत्ति नहीं है। यह मात्र इसलिए है कि शरीर के एक अंग को हरकत में लाकर उसे आनन्द मिलता है।
यानि कि यह शरीर में किसी प्रकार की समस्या के कारण है। सैक्स के प्रति अतिरिक्त इच्छा जो कि कभी कभी बलात्कार करने की स्थिति तक ले आती है, शरीर में किसी प्रकार की कमी के कारण भी हो सकती है। ऐसे व्यक्ति को बलात्कार करने की सजा अवश्य दी जाए परन्तु क्या उसके शरीर की उस कमी का इलाज नहीं किया जाना चाहिए?
क्या हमारा कानून ऐसा कोई प्रावधान रखता है? नहीं।
क्या हमारा समाज इस बात को सुनना भी चाहेगा कि यह बलात्कारी है, इसे एक बार डाक्टर को भी दिखा दो।
सब यही चिल्लाएंगे कि इसे सिर्फ सजा दो ताकि बाकी लोग भी डर जाएं।
यह समस्या शारीरिक से भी अधिक मनोवैज्ञाविक समस्या है। एक अवस्था के पश्चात् शरीर में जब परिवर्तन होते हैं तो सैक्स की भावना स्वाभाविक रूप से हर पुरूष और स्त्री के मन में आती है। यह बहुत स्वाभाविक वृत्ति है। परन्तु अवस्था के उस दौर में सही शिक्षा नहीं मिल पाती और समाज में व्याप्त भ्रांतियों के चलते एक डर और छिपाव की मानसिकता पैदा कर दी जाती है। जिससे स्वाभाविक इच्छा और उत्सुकता कुंठा का रूप ले लेती है। सैक्स जैसी भावना एक मायाजाल बन जाती है। एक तो शरीर में होता परिवर्तन और दूसरे उसके प्रति हीन भावना और डर! स्थिति यह हो जाती है कि कम उम्र का किशोर या किशोरी कुंठा में रहते हैं। यह कुंठा भीतर ही भीतर बहुत उलझाव ले लेती है और एक मनोवैज्ञानिक रोग तक बन जाती है। बलात्कार के लिए ऐसी मानसिकता कहीं अधिक जिम्मेवार होती है। इसका इलाज किया जाना चाहिए परन्तु अफसोस कि हमारा समाज इसे मनोवैज्ञानिक समस्या मानना ही नहीं चाहता।
इसलिए यह कहा जा सकता है कि बलात्कारी के अपराध का कारण सिर्फ सैक्स के प्रति उसकी भूख और उसका अपराधी स्वभाव नहीं होता, उसके पीछे अन्य शारीरिक और मनोवैज्ञानिक कारण भी होते हैं। समाज और कानून को यह चाहिए कि वह इसे स्वीकारे सजा के साथ उसके इलाज की भी व्यवस्था करे।
एक अन्य बात भी की जानी चाहिए। हर विद्यालय में हर सप्ताह मनोविज्ञान की कक्षाएं लगानी चाहिएं। किशोरवय के बच्चों को विश्वास के सौहार्दमय वातावरण में उनकी शंकाओं को खुलकर बताने का अवसर दिया जाना चाहिए।
ऐसे और भी बहुत से उपाय होने चाहिएं जिससे इस समस्या को समझा और समय पर इलाज जा सके। इसपर बहुत लम्बी चर्चा हो जाएगी।
पर सबसे पहले तो हमारा समाज और कानून इस समस्या को सही प्रकार समझने के लिए तैयार तो हो।
-सुरेश बरनवाल/21.3.2020
True and very well written ������������
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